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ॐ तत्सत् व्याख्या (अध्याय 17 शलोक 23 से 28)

ॐ तत्सत् व्याख्या (अध्याय 17 शलोक 23 से 28)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 23

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥17- 23॥

Hॐ तत सत् – इस प्रकार ब्रह्म का तीन प्रकार का निर्देश कहा गया है। उसी से पुरातन काल में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों का विधान हुआ है।

EOm, tat , and sat are three epithets used for the Supreme Being from whom at the outset there came forth the Brahmin, Ved, and yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 24
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥17- 24॥

Hइसलिये ब्रह्मवादि शास्त्रों में बताई विधि द्वारा सदा ॐ के उच्चारण द्वारा यज्ञ, दान और तप क्रियायें आरम्भ करते हैं।

EIt is hence that the deeds of yagya, charity, and penance, as ordained by scripture, are always initiated by the devotees of Ved with a resonant utterance of the syllable OM.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 25
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥17- 25॥

Hऔर मोक्ष की कामना करने वाले मनुष्य “तत” कह कर फल की इच्छा त्याग कर यज्ञ, तप औऱ दान क्रियायें करते हैं। (तत अर्थात वह)

EStripped of desire for any reward and holding that God is all pervading, persons who aspire to the ultimate bliss embark on the tasks of yagya, penance, and charity as ordained by scripture.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 26
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥17- 26॥

Hहे पार्थ, सद-भाव (सत भाव) तथा साधु भाव में सत शब्द का प्रयोग किया जाता है। उसी प्रकार प्रशंसनीय कार्य में भी ‘सत’ शब्द प्रयुक्त होता है।

HSat is employed to express the ideas of truth and excellence, and, O Parth, the word is also used to denote a propitious act.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥17- 27॥

Hयज्ञ, तप तथा दान में स्थिर होने को भी सत कहा जाता है। तथा भगवान के लिये ही कर्म करने को भी ‘सत’ कहा जाता है।

EAnd it is said that the condition inherent in yagya, penance, and charity, as well as the endeavour to attain to God, is also real.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 17 शलोक 28
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥17- 28॥

Hजो भी यज्ञ, दान, तपस्या या कार्य श्रद्धा बिना किया जाये, हे पार्थ उसे ‘असत्’ कहा जाता है, न उस से यहाँ कोई लाभ होता है, और न ही आगे।

ETherefore, O Parth, is it said that, devoid of faith, the oblation and alms that are offered and the penance that is suffered, as well as all other similar ventures, are all false, for they can do us good neither in this world nor in the next.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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