Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता02. सांख्ययोगनिष्काम कर्मयोग (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 39 से 53)

निष्काम कर्मयोग (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 39 से 53)

निष्काम कर्मयोग (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 39 से 53)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 39

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥2- 39॥

H यह मैने तुम्हें साँख्य योग की दृष्टी से बताया। अब तुम कर्म योग की दृष्टी से सुनो| इस बुद्धी को धारण करके तुम कर्म के बन्धन से छुटकारा पा लोगे||

E This knowledge which I have imparted to you, O Parth, is related to Gyan Yog, the Way of knowledge, and now you should listen to me on Karm Yog, the Way of Selfless Action, with which you can successfully sever the fetters of action as well as its consequence (karm).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 40
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥2- 40॥

H न इसमें की गई मेहनत व्यर्थ जाती है और न ही इसमें कोई नुकसान होता है| इस धर्म का जरा सा पालन करना भी महान डर से बचाता है||

E Since selfless action neither wears out the seed from which it sprang nor has any adverse consequence, even a partial observance of this dharm liberates (one) from the dire terror (of repeated birth and death)
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 41
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥2- 41॥

H इस धर्म का पालन करती बुद्धी ऐक ही जगह स्थिर रहती है| लेकिन जिनकी बुद्धी इस धर्म में नहीं है वह अन्तहीन दिशाओं में बिखरी रहती है||

E On this auspicious path, O Kurunandan (Arjun), the resolute mind is one, but the minds of the ignorant are divided and many.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 42, 43
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥2- 42॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥2- 43॥

H हे पार्थ, जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है, वेदों का भाषण करते हैं और जिनके लिये उससे बढकर और कुछ नहीं है, जिनकी आत्मा इच्छायों से जकड़ी हुई है और स्वर्ग जिनका मकस्द है वह ऍसे कर्म करते हैं जिनका फल दूसरा जनम है। तरह तरह के कर्मों में फसे हुऐ और भोग ऍश्वर्य की इच्छा करते हऐ वे ऍसे लोग ही ऐसे भाषणों की तरफ खिचते हैं||

E Desire-ridden men, O Parth, who are given only to listening to Vedic promises of rewards for action, who believe that the attainment of heaven is the highest goal of temporal birth and its activities, and who speak pretentious words to describe the many rites and ceremonies that they regard as conducive to the achievement of worldly pleasure and power, are ignorant and bereft of discernment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 44
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥2- 44॥

H भोग ऍश्वर्य से जुड़े जिनकी बुद्धी हरी जा चुकी है, ऍसी बुद्धी कर्म योग मे स्थिरता ग्रहण नहीं करती||

E Delighted by ornamental words and attached to worldly pleasures and dominance, men without discrimination have irresolute minds.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 45
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥2- 45॥

H वेदों में तीन गुणो का व्यखान है| तुम इन तीनो गुणों का त्याग करो, हे अर्जुन| द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो| सत में खुद को स्थिर करो| लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो और खुद में स्थित हो||

E Since all the Ved, O Arjun, only illumine the three properties, you should rise above them, be free from the contradictions of happiness and sorrow, rest on that which is constant, and be unconcerned with getting what you do not have as well as with protecting what you have, in order to dedicate yourself to the Self within.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 46
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥2- 46॥

H हर जगह पानी होने पर जितना सा काम ऐक कूँऐ का होता है, उतना ही काम ज्ञानमंद को सभी वेदों से है॥मतलब यह की उस बुद्धिमान पुरुष के लिये जो सत्य को जान चुका है, वेदों में बताये भोग प्राप्ती के कर्मों से कोई मतलब नहीं है||

E After the final absolution a man does not need the Ved, just as we do not need a pond when there is the allstretching ocean (around).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥2- 47॥

H कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं| कर्म को फल के लिये मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो||

E Since you are entitled only to the performance of action but never to the fruits thereof, you should neither desire rewards of action nor be drawn to inaction.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 48
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥2- 48॥

H योग में स्थित रह कर कर्म करो, हे धनंजय, उससे बिना जुड़े हुऐ| काम सफल हो न हो, दोनो में ऐक से रहो। इसी समता को योग कहते हैं||

E The equipoise of mind that arises from profound absorption in the performance of action after renouncing attachment and being even-minded in respect of success and failure is, O Dhananjay (Arjun), given the name of yog.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 49
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥2- 49॥

H इस बुद्धी योग के द्वारा किया काम तो बहुत ऊँचा है| इस बुद्धि की शरण लो| काम को फल कि इच्छा से करने वाले तो कंजूस होते हैं||

E Take refuge in the way of equanimity (yog), Dhananjay, because action with desire for the fruits thereof is far inferior to the path of discrimination, and they are indeed paupers who are motivated by lust (for rewards).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 50
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥2- 50॥

H इस बुद्धि से युक्त होकर तुम अच्छे और बुरे कर्म दोनो से छुटकारा पा लोगे| इसलिये योग को धारण करो। यह योग ही काम करने में असली कुशलता है||

E As the Soul endowed with a mind of equanimity renounces both meritorious and evil deeds in this world itself and the art of acting with equipoise is yog, the endeavour to master the way of equanimity of discrimination is Samattwa Yog.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 51
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥2- 51॥

H इस बुद्धि से युक्त होकर मुनि लोग किये हुऐ काम के नतीजों को त्याग देते हैं| इस प्रकार जन्म बन्धन से मुक्त होकर वे दुख से परे स्थान प्राप्त करते हैं||

E Renouncing all desire for the fruits of their action and (thus) freed from the bondage of birth, wise men who are skilled in the way of equanimity and discrimination achieve the pure, immortal state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 52
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥2- 52॥

H जब तुम्हारी बुद्धि अन्धकार से ऊपर उठ जाऐगी तब क्या सुन चुके हो और क्या सुनने वाला है उसमे तुमहें कोई मतलब नहीं रहेगा||

E At the time when your mind has successfully made its way across the swamp of attachment, you will be capable of the renunciation which is worth hearing of and which you have heard.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 53
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥2- 53॥

H ऐक दूसरे को काटते उपदेश और श्रुतियां सुन सुन कर जब तुम अडिग स्थिर रहोगे, तब तुम्हारी बुद्धी स्थिर हो जायेगी और तुम योग को प्राप्त कर लोगे||

E When your mind, now shaken by the conflicting precepts of the Ved, achieves a changeless and constant existence within the being of Supreme Spirit, you will then attain to immortal state through profound meditation.

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