Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता02. सांख्ययोगश्री कृष्णार्जुन वार्ताला (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 1 से 72)

श्री कृष्णार्जुन वार्ताला (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 1 से 72)

श्री कृष्णार्जुन वार्ताला (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 2 शलोक 1 से 72)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 1

संजय बोले (Sanjay Said):

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥2- 1॥

H तब चिंता और विशाद में डूबे अर्जुन को, जिसकी आँखों में आँसू भर आऐ थे, मधुसूदन ने यह वाक्य कहे॥

 

E To him (Arjun), whose eyes were brimming with tears of grief because he was overcome by pity, Madhusudan spoke thus.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 2
श्रीभगवान बोले (The Lord said):

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥2- 2॥

H हे अर्जुन, यह तुम किन विचारों में डूब रहे हो जो इस समय गलत हैं और स्वर्ग और कीर्ती के बाधक हैं॥

 

E From what cause, O Arjun, does this unmanly (un-Arjun-like), heaven-barring, and shameful despair come over you at this perilous spot?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 3

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥2- 3॥

H तुम्हारे लिये इस दुर्बलता का साथ लेना ठीक नहीं। इस नीच भाव, हृदय की दुर्बलता, का त्याग करके उठो हे परन्तप॥

 

E Don’t give in, O Parth, to unmanliness for it does not become you. So, O Parantap, stand up and drive away this disgraceful weakness of your heart.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 4

अर्जुन बोले (Arjun Said):

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥2- 4॥

H हे अरिसूदन, मैं किस प्रकार भीष्म, संख्य और द्रोण से युध करुँगा। वे तो मेरी पूजा के हकदार हैं॥

 

E How, O Madhusudan, slayer of enemies, shall I shoot arrows in the battle against men like Bheeshm and Dron who deserve only honour?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 5

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥2- 5॥

H इन महानुभाव गुरुयों की हत्या से तो भीख माँग कर जीना ही बेहतर होगा। इन को मारकर जो भोग हमें प्राप्त होंगे वे सब तो खून से रँगे होंगे॥

 

E Even to live in this world as a mendicant begging for alms is better than killing teachers, for if l kill them all my joys and riches and desires in this world will be drenched in (their) blood.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥2- 6॥

H हम तो यह भी नहीं जानते की हम जीतेंगे याँ नहीं, और यह भी नहीं की दोनो में से बेहतर क्या है, उनका जीतना या हमारा, क्योंकि जिन्हें मार कर हम जीना भी नहीं चाहेंगे वही धार्तराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़ें हैं॥

 

E I hardly know which is better, their (the Kaurav’s) conquering us or our conquering them – even Dhritrashtr ’s sons -who are our enemies, and yet after killing whom we may not wish to live.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 7

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥2- 7॥

H इस दुख चिंता ने मेरे स्वभाव को छीन लिया है और मेरा मन शंका से घिरकर सही धर्म को नहीं हेख पा रहा है। मैं आप से पूछता हूँ, जो मेरे लिये निष्चित प्रकार से अच्छा हो वही मुझे बताइये॥मैं आप का शिष्य हूँ और आप की ही शरण लेता हूँ॥

 

E With my mind swamped with feeble pity and confusion regarding duty, I entreat you to instruct me as to what is definitely conducive to my glory, for I am your disciple and have taken refuge in you.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 8

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥2- 8॥

H मुझे नहीं दिखता कैसे इस दुखः का, जो मेरी इन्द्रीयों को सुखा रहा है, अन्त हो सकता है, भले ही मुझे इस भूमी पर अति समृद्ध और शत्रुहीन राज्य यां देवतायों का भी राज्यपद क्यों न मिल जाऐ॥

 

E I do not see that obtaining an undisputed and profitable dominion over the whole earth or, (for that matter) even lordship over the gods, can cure the grief that is wearing out my senses.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 9

संजय बोले (Sanjay Said):

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥2- 9॥

H हृषिकेश, श्री गोविन्द जी को परन्तप अर्जुन, गुडाकेश यह कह कर चुप हो गये कि मैं युध नहीं करुँगा॥

 

E After having thus spoken to Hrishikesh, Arjun, the conqueror of sleep and destroyer of foes, told Govind (Krishn) that he would not fight, and then he fell silent.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 10

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥2- 10॥

H हे भारत, दो सेनाओं के बीच में शोक और दुख से घिरे अर्जुन को प्रसन्नता से हृषीकेश ने यह बोला॥

 

E Hrishikesh then, O Bharat (Dhritrashtr), with a smile as it appeared, spoke thus to him (Arjun) who sat mournfully between the two armies.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 11

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥2- 11॥

H जिन के लिये शोक नहीं करना चाहिये उनके लिये तुम शोक कर रहे हो और बोल तुम बुद्धीमानों की तरहँ रहे हो| ज्ञानी लोग न उन के लिये शोक करते है जो चले गऐ और न उन के लिये जो हैं||

 

E Although sorrowing over those who ought not to be grieved for, you yet speak wise words; but the discriminating mourn over neither the living nor those who are dead.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 12

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥2- 12॥

H न तुम्हारा न मेरा और न ही यह राजा जो दिख रहे हैं इनका कभी नाश होता है| और यह भी नहीं की हम भविष्य मे नहीं रहेंगे||

 

E It is not that either you or I, or all these kings, did not exist in the past, nor is it that our being will come to an end in the future.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥2- 13॥

H आत्मा जैसे देह के बाल, युवा यां बूढे होने पर भी वैसी ही रहती है उसी प्रकार देह का अन्त होने पर भी वैसी ही रहती है| बुद्धीमान लोग इस पर व्यथित नहीं होते||

 

E Since the embodied Spirit passes through infancy, youth, and old age in the body, and then transmigrates into another body, men with steadfast minds do not grieve over his passing away.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥2- 14॥

H हे कौन्तेय, सरदी गरमी सुखः दुखः यह सब तो केवल स्पर्श मात्र हैं| आते जाते रहते हैं, हमेशा नहीं रहते, इन्हें सहन करो, हे भारत||

 

E There are sensations of heat and cold, and of pain and pleasure, O son of Kunti, as senses meet their objects. Bear them patiently, O Bharat, because they have a beginning and an end, and are transient.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥2- 15॥

H हे पुरुषर्षभ, वह धीर पुरुष जो इनसे व्यथित नहीं होता, जो दुख और सुख में एक सा रहता है, वह अमरता के लायक हो जाता है||

 

E So, O the noblest of men (Arjun), one who is possessed of equanimity in pain and pleasure, and firm, and untormented by these (feelings produced by the meeting of senses with their objects), deserves (to taste) the nectar of immortality.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥2- 16॥

H न असत कभी रहता है और सत न रहे ऐसा हो नहीं सकता| इन होनो की ही असलीयत वह देख चुके हैं जो सार को देखते हैं||

 

E The unreal has no being and the real has no non-being; and the truth about both has also been seen by men who know the reality.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥2- 17॥

H तुम यह जानो कि उसका नाश नहीं किया जा सकता जिसमे यह सब कुछ स्थित है| क्योंकि जो अमर है उसका नाश करना किसी के बस में नहीं||

 

E Know that since the Spirit which pervades the universe is imperishable and immutable, no one can effect his destruction.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥2- 18॥

H यह देह तो मरणशील है, लेकिन शरीर में बैठने वाला अन्तहीन कहा जाता है| इस आत्मा का न तो अन्त है और न ही इसका कोई मेल है, इसलिऐ युद्ध करो हे भारत||

 

E Fight, O Bharat (Arjun), because while the bodies which clothe the Soul are said to come to an end, the embodied Spirit itself is for ever, indestructible, and boundless.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥2- 19॥

H जो इसे मारने वाला जानता है या फिर जो इसे मरा मानता है, वह दोनों ही नहीं जानते। यह न मारती है और न मरती है||

 

E They are both ignorant, he who believes that the Self slays and he who thinks that he is slain, for he neither slays nor he is slain.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 20

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥2- 20॥

H यह न कभी पैदा होती है और न कभी मरती है| यह तो अजन्मी, अन्तहीन, शाश्वत और अमर है। सदा से है, कब से है। शरीर के मरने पर भी इसका अन्त नहीं होता||

 

E Neither (ever) born nor dying, neither at any time coming into being nor ceasing to be, the Self is birthless, perpetual, unchanging, and timeless, and he is not destroyed when the body is destroyed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥2- 21॥

H हे पार्थ, जो पुरुष इसे अविनाशी, अमर और जन्महीन, विकारहीन जानता है, वह किसी को कैसे मार सकता है यां खुद भी कैसे मर सकता है||

 

E How can he, O Parth, who is conscious of the Soul within as imperishable, permanent, birthless, and immutable, kill or move another to kill?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 22

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥2- 22॥

H जैसे कोई व्यक्ती पुराने कपड़े उतार कर नऐ कपड़े पहनता है, वैसे ही शरीर धारण की हुई आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर प्राप्त करती है||

 

E Like a man who puts on new garments after discarding his worn out clothes, the embodied Self, also, casts off tattered bodies and transmigrates into other bodies that are new.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥2- 23॥

H न शस्त्र इसे काट सकते हैं और न ही आग इसे जला सकती है| न पानी इसे भिगो सकता है और न ही हवा इसे सुखा सकती है||

 

E This Self is neither pierced by weapons, nor burnt by fire, nor made damp by water, nor dried up by wind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 24

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥2- 24॥

H यह अछेद्य है, जलाई नहीं जा सकती, भिगोई नहीं जा सकती, सुखाई नहीं जा सकती| यह हमेशा रहने वाली है, हर जगह है, स्थिर है, अन्तहीन है||

 

E The Self, which cannot be pierced or burnt or made wet or faded, is uninterrupted, all-pervasive, constant, immovable, and eternal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥2- 25॥

H यह दिखती नहीं है, न इसे समझा जा सकता है। यह बदलाव से रहित है, ऐसा कहा जाता है| इसलिये इसे ऐसा जान कर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ||

 

E Knowing that the Self is unmanifest, a non-object to the senses, incomprehensible because he is a non-object to the mind, and changeless, (O Arjun), it does not befit you to grieve (over him).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 26

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥2- 26॥

H हे महाबाहो, अगर तुम इसे बार बार जन्म लेती और बार बार मरती भी मानो, तब भी, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ||

 

E You ought not to grieve, O the mighty-armed, even if you think of him (the Self) as ever-born and ever-dying.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 27

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥2- 27॥

H क्योंकि जिसने जन्म लिया है, उसका मरना निष्चित है। मरने वाले का जन्म भी तय है| जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता उसके बारे तुम्हें शोक नहीं करना चाहिऐ||

 

E Since this also proves the certain death of what is born and the certain birth of what dies, you ought not to grieve over the inevitable.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥2- 28॥

H हे भारत, जीव शुरू में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं| इस में दुखी होने की क्या बात है||

 

E Why grieve over the matter, O Bharat (Arjun), when all beings, disembodied before birth and disembodied after death, appear to possess a body only between the two events?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥2- 29॥

H कोई इसे आश्चर्य से देखता है, कोई इसके बारे में आश्चर्य से बताता है, और कोई इसके बारे में आश्चर्यचित होकर सुनता है, लेकिन सुनने के बाद भी कोई इसे नहीं जानता||

 

E Only a seer views the Soul as a marvel, another one describes him as a marvel, and yet another one hears him as marvel. While there are some who hear him and yet know him not.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 30

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥2- 30॥

H हे भारत, हर देह में जो आत्मा है वह नित्य है, उसका वध नहीं किया जा सकता| इसलिये किसी भी जीव के लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये||

 

E Since the Self dwelling in all bodies is unslayable, O Bharat, it does not befit you to grieve for living beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 31

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥2- 31॥

H अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढकर ऐक क्षत्रीय के लिये कुछ नहीं है||

 

E In view of your own dharm, too, it is unworthy of you to fear, for there is nothing more propitious for a Kshatriya than a righteous war.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 32

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥2- 32॥

H हे पार्थ, सुखी हैं वे क्षत्रिय जिन्हें ऐसा युद्ध मिलता है जो स्वयंम ही आया हो और स्वर्ग का खुला दरवाजा हो||

 

E Blessed indeed, O Parth, are the Kshatriy who, without seeking, come upon such a war which is like an open door to heaven.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 33

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥2- 33॥

H लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे||

 

E And if you do not engage in this righteous war, you will lose the dharm of your Self and glory, and be guilty of sin.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 34

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥2- 34॥

H तुम्हारे अन्तहीन अपयश की लोग बातें करेंगे| ऐसी अकीर्ती एक प्रतीष्ठित मनुष्य के लिये मृत्यु से भी बढ कर है||

 

E And all will for ever speak of your disgrace and such disgrace is worse than death itself for a man of honour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 35

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥2- 35॥

H महारथी योद्धा तुम्हें युद्ध के भय से भागा समझेंगें| जिनके मत में तुम ऊँचे हो, उन्हीं की नजरों में गिर जाओगे||

 

E Even the great warriors who have a high regard for you will then scorn you for having turned your back upon the war out of fear.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 36

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥2- 36॥

H अहित की कामना से बहुत ना बोलने लायक वाक्यों से तुम्हारे विपक्षी तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करेंगें। इस से बढकर दुखदायी क्या होगा||

 

E There can be nothing more painful for you than the disparaging and improper words your adversaries will speak against your valour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥2- 37॥

H यदि तुम युद्ध में मारे जाते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि जीतते हो तो इस धरती को भोगोगे। इसलिये उठो, हे कौन्तेय, और निश्चय करके युद्ध करो||

 

E Rise up with determination for the war because if you die in it you will attain to heaven and, if you win, you will attain to the most exalted glory.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥2- 38॥

H सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को ऐक सा देखते हुऐ ही युद्ध करो। ऍसा करते हुऐ तुम्हें पाप नहीं मिलेगा||

 

E You will not incur sin if you get up and fight the war, treating victory and defeat, profit and loss, and happiness and sorrow, alike.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 39

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥2- 39॥

H यह मैने तुम्हें साँख्य योग की दृष्टी से बताया। अब तुम कर्म योग की दृष्टी से सुनो| इस बुद्धी को धारण करके तुम कर्म के बन्धन से छुटकारा पा लोगे||

 

E This knowledge which I have imparted to you, O Parth, is related to Gyan Yog, the Way of knowledge, and now you should listen to me on Karm Yog, the Way of Selfless Action, with which you can successfully sever the fetters of action as well as its consequence (karm).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 40

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥2- 40॥

H न इसमें की गई मेहनत व्यर्थ जाती है और न ही इसमें कोई नुकसान होता है| इस धर्म का जरा सा पालन करना भी महान डर से बचाता है||

 

E Since selfless action neither wears out the seed from which it sprang nor has any adverse consequence, even a partial observance of this dharm liberates (one) from the dire terror (of repeated birth and death)
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 41

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥2- 41॥

H इस धर्म का पालन करती बुद्धी ऐक ही जगह स्थिर रहती है| लेकिन जिनकी बुद्धी इस धर्म में नहीं है वह अन्तहीन दिशाओं में बिखरी रहती है||

 

E On this auspicious path, O Kurunandan (Arjun), the resolute mind is one, but the minds of the ignorant are divided and many.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 42, 43

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥2- 42॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥2- 43॥

H हे पार्थ, जो घुमाई हुईं फूलों जैसीं बातें करते है, वेदों का भाषण करते हैं और जिनके लिये उससे बढकर और कुछ नहीं है, जिनकी आत्मा इच्छायों से जकड़ी हुई है और स्वर्ग जिनका मकस्द है वह ऍसे कर्म करते हैं जिनका फल दूसरा जनम है। तरह तरह के कर्मों में फसे हुऐ और भोग ऍश्वर्य की इच्छा करते हऐ वे ऍसे लोग ही ऐसे भाषणों की तरफ खिचते हैं||

 

E Desire-ridden men, O Parth, who are given only to listening to Vedic promises of rewards for action, who believe that the attainment of heaven is the highest goal of temporal birth and its activities, and who speak pretentious words to describe the many rites and ceremonies that they regard as conducive to the achievement of worldly pleasure and power, are ignorant and bereft of discernment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 44

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥2- 44॥

H भोग ऍश्वर्य से जुड़े जिनकी बुद्धी हरी जा चुकी है, ऍसी बुद्धी कर्म योग मे स्थिरता ग्रहण नहीं करती||

 

E Delighted by ornamental words and attached to worldly pleasures and dominance, men without discrimination have irresolute minds.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 45

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥2- 45॥

H वेदों में तीन गुणो का व्यखान है| तुम इन तीनो गुणों का त्याग करो, हे अर्जुन| द्वन्द्वता और भेदों से मुक्त हो| सत में खुद को स्थिर करो| लाभ और रक्षा की चिंता छोड़ो और खुद में स्थित हो||

 

E Since all the Ved, O Arjun, only illumine the three properties, you should rise above them, be free from the contradictions of happiness and sorrow, rest on that which is constant, and be unconcerned with getting what you do not have as well as with protecting what you have, in order to dedicate yourself to the Self within.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 46

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥2- 46॥

H हर जगह पानी होने पर जितना सा काम ऐक कूँऐ का होता है, उतना ही काम ज्ञानमंद को सभी वेदों से है॥मतलब यह की उस बुद्धिमान पुरुष के लिये जो सत्य को जान चुका है, वेदों में बताये भोग प्राप्ती के कर्मों से कोई मतलब नहीं है||

 

E After the final absolution a man does not need the Ved, just as we do not need a pond when there is the allstretching ocean (around).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥2- 47॥

H कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है लेकिन फल की इच्छा से कभी नहीं| कर्म को फल के लिये मत करो और न ही काम न करने से जुड़ो||

 

E Since you are entitled only to the performance of action but never to the fruits thereof, you should neither desire rewards of action nor be drawn to inaction.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥2- 48॥

H योग में स्थित रह कर कर्म करो, हे धनंजय, उससे बिना जुड़े हुऐ| काम सफल हो न हो, दोनो में ऐक से रहो। इसी समता को योग कहते हैं||

 

E The equipoise of mind that arises from profound absorption in the performance of action after renouncing attachment and being even-minded in respect of success and failure is, O Dhananjay (Arjun), given the name of yog.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥2- 49॥

H इस बुद्धी योग के द्वारा किया काम तो बहुत ऊँचा है| इस बुद्धि की शरण लो| काम को फल कि इच्छा से करने वाले तो कंजूस होते हैं||

 

E Take refuge in the way of equanimity (yog), Dhananjay, because action with desire for the fruits thereof is far inferior to the path of discrimination, and they are indeed paupers who are motivated by lust (for rewards).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 50

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥2- 50॥

H इस बुद्धि से युक्त होकर तुम अच्छे और बुरे कर्म दोनो से छुटकारा पा लोगे| इसलिये योग को धारण करो। यह योग ही काम करने में असली कुशलता है||

 

E As the Soul endowed with a mind of equanimity renounces both meritorious and evil deeds in this world itself and the art of acting with equipoise is yog, the endeavour to master the way of equanimity of discrimination is Samattwa Yog.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥2- 51॥

H इस बुद्धि से युक्त होकर मुनि लोग किये हुऐ काम के नतीजों को त्याग देते हैं| इस प्रकार जन्म बन्धन से मुक्त होकर वे दुख से परे स्थान प्राप्त करते हैं||

 

E Renouncing all desire for the fruits of their action and (thus) freed from the bondage of birth, wise men who are skilled in the way of equanimity and discrimination achieve the pure, immortal state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥2- 52॥

H जब तुम्हारी बुद्धि अन्धकार से ऊपर उठ जाऐगी तब क्या सुन चुके हो और क्या सुनने वाला है उसमे तुमहें कोई मतलब नहीं रहेगा||

E At the time when your mind has successfully made its way across the swamp of attachment, you will be capable of the renunciation which is worth hearing of and which you have heard.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 53

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥2- 53॥

H ऐक दूसरे को काटते उपदेश और श्रुतियां सुन सुन कर जब तुम अडिग स्थिर रहोगे, तब तुम्हारी बुद्धी स्थिर हो जायेगी और तुम योग को प्राप्त कर लोगे||

 

E When your mind, now shaken by the conflicting precepts of the Ved, achieves a changeless and constant existence within the being of Supreme Spirit, you will then attain to immortal state through profound meditation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 54

अर्जुन बोले (Arjun Said):

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥2- 54॥

H हे केशव, जिसकी बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो चुकि है, वह कैसा होता है| ऍसा स्थिरता प्राप्त किया व्यक्ती कैसे बोलता, बैठता, चलता, फिरता है||

 

E what, O Keshav, is the mark of the man who has attained the state of true meditation and equanimity of mind, and how does this man with firm discrimination speak, sit, and walk ?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 55

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥2- 55॥

H हे पार्थ, जब वह अपने मन में स्थित सभी कामनाओं को निकाल देता है, और अपने आप में ही अपनी आत्मा को संतुष्ट रखता है, तब उसे ज्ञान और बुद्धिमता में स्थित कहा जाता है||

 

E A man is then said to be steadfast in mind when he has renounced all the desires of his mind and achieved contentment of the Self through the Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥2- 56॥

H जब वह दुखः से विचलित नहीं होता और सुख से उसके मन में कोई उमंगे नहीं उठतीं, इच्छा और तड़प, डर और गुस्से से मुक्त, ऐसे स्थित हुऐ धीर मनुष्य को ही मुनि कहा जाता है||

 

E He is indeed a steady-minded sage who is unmoved by sorrow and indifferent to happiness, and who has overcome his passion, fear and anger.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 57
शलोक 57

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2- 57॥

H किसी भी ओर न जुड़ा रह, अच्छा या बुरा कुछ भी पाने पर, जो ना उसकी कामना करता है और न उससे नफरत करता है उसकी बुद्धि ज्ञान में स्थित है||

 

E That man has a steady mind who is entirely free from attachment and who neither gloats over success nor abhors failure.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2- 58॥

H जैसे कछुआ अपने सारे अँगों को खुद में समेट लेता है, वैसे ही जिसने अपनी इन्द्रीयाँ को उनके विषयों से निकाल कर खुद में समेट रखा है, वह ज्ञान में स्थित है||

 

E As a turtle pulls in its limbs, this man reins in his senses from all objects, and then he truly has a steady mind.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥2- 59॥

H विषयों का त्याग के देने पर उनका स्वाद ही बचता है| परम् को देख लेने पर वह स्वाद भी मन से छूट जाता है||

 

E While objects of sensual pleasure cease to be for the man who withdraws his senses from them, his desire for these objects yet remains; but the desires of the man of discrimination are completely erased by his perception of God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 60, 61

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥2- 60॥

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2- 61॥

H हे कौन्तेय, सावधानी से संयमता का अभयास करते हुऐ पुरुष के मन को भी उसकी चंचल इन्द्रीयाँ बलपूर्वक छीन लिती हैं|| उन सब को संयम कर मेरा धयान करना चाहिये, क्योंकि जिसकी इन्द्रीयाँ वश में है वही ज्ञान में स्थित है||

 

E O son of Kunti, men ought to subdue their senses which seize forcibly even wise and striving minds, and devote themselves to me with perfect concentration, because only that man’s mind is unwavering who has achieved control of his senses.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥2- 62॥

H चीजों के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उन से लगाव हो जाता है| इससे उसमे इच्छा पौदा होती है और इच्छाओं से गुस्सा पैदा होता है||

 

E They whose thoughts are of sensual objects are attached to them, attachment gives rise to desires, and anger is born when these desires are obstructed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 63

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥2- 63॥

H गुस्से से दिमाग खराब होता है और उस से यादाश्त पर पड़दा पड़ जाता है| यादाश्त पर पड़दा पड़ जाने से आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाने पर आदमी खुद ही का नाश कर बौठता है||

 

E Delusion is born from anger, by which memory is confused; confusion of memory undermines the faculty of discrimination and, when discrimination is lost, the seeker deviates from the means of absolution.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 64

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥2- 64॥

H इन्द्रीयों को राग और द्वेष से मुक्त कर, खुद के वश में कर, जब मनुष्य विषयों को संयम से ग्रहण करता है, तो वह प्रसन्नता और शान्ती प्राप्त करता है||

 

E But that man achieves spiritual tranquillity who has mastered his mind, and who remains unaffected by sense-objects although he may be roaming amidst them, because his senses are properly restrained.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥2- 65॥

H शान्ती से उसके सारे दुखों का अन्त हो जाता है क्योंकि शान्त चित मनुष्य की बुद्धि जलदि ही स्थिर हो जाती है||

 

E After realizing the ultimate repose, all his (the seeker’s) sorrows disappear, and the blissful mind of such a man quickly grows in firmness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 66

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥2- 66॥

H जो संयम से युक्त नहीं है, जिसकी इन्द्रीयाँ वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि भी स्थिर नही हो सकती और न ही उस में शान्ति की भावना हो सकती है| और जिसमे शान्ति की भावना नहीं है वह शान्त कैसे हो सकता है। जो शान्त नहीं है उसे सुख कैसा||

 

E A man without spiritual accomplishment has no wisdom nor true faith, and a man without devotion knows no peace of mind. Since happiness depends on peace, how can such men be happy?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 67

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥2- 67॥

H मन अगर विचरती हुई इन्द्रीयों के पीछे कहीं भी लग लेता है तो वह बुद्धि को भी अपने साथ वैसे ही खीँच कर ले जाता है जैसे एक नाव को हवा खीच ले जाती है||

 

E For, as the wind captures the boat on water, just so even one of the senses, that roam amidst objects of their gratification and with which the intellect dwells, is strong enough to sweep away the discrimination of one who is unpossessed of spiritual attainment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 68

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2- 68॥

H इसलिये हे महाबाहो, जिसकी सभी इन्द्रीयाँ अपने विषयों से पूरी तरह हटी हुई हैं, सिमटी हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है||

 

E Therefore, O the mighty-armed (Arjun), the man who prevents his senses from straying to objects has a steady discrimination.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 69

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥2- 69॥

H जो सब के लिये रात है उसमें संयमी जागता है, और जिसमे सब जागते हैं उसे मुनि रात की तरह देखता है||

 

E The true worshipper (yogi) remains awake amidst what is night for all creatures, but the perishable and transient worldly pleasures amidst which all living creatures stay awake are like night for the sage who has perceived reality.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥2- 70॥

H नदियाँ जैसे समुद्र, जो एकदम भरा, अचल और स्थिर रहता है, में आकर शान्त हो जाती हैं, उसी प्रकार जिस मनुष्य में सभी इच्छाऐं आकर शान्त हो जाती हैं, वह शान्ती प्राप्त करता है| न कि वह जो उनके पीछे भागता है||

 

E As the water of the many rivers falls into the full and ever constant ocean without affecting its tranquillity, even so the pleasures of sense merge into a man of steady discrimination without producing any deviation, and such a man attains the state of the most sublime peace rather than yearn for sensual enjoyment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 71

विहाय कामान्यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥2- 71॥

H सभी कामनाओं का त्याग कर, जो मनुष्य स्पृह रहित रहता है, जो मै और मेरा रूपी अहंकार को भूल विचरता है, वह शान्ती को प्राप्त करता है||

 

E The man who has renounced all desires, and who conducts himself without ego, arrogance, and attachment, is the one who achieves peace.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 2 शलोक 72

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥2- 72॥

H ब्रह्म में स्थित मनुष्य ऍसा होता है, हे पार्थ। इसे प्राप्त करके वो फिर भटकता नहीं। अन्त समय भी इसी स्थिति में स्थित वह ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता है||

 

E Such, O Arjun, is the steadfastness of the man who has realized God; after attaining this state he subdues all temptation and, resting firmly in his faith, with his death he continues in this state of rapture of the union of his Self with God.
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