🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता09. राजविद्याराजगुह्ययोगपूजा के फल (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 20 से 25)

पूजा के फल (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 20 से 25)

पूजा के फल (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 20 से 25)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 20

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥9- 20॥

Hतीन वेदों (ऋग, साम, यजुर) के ज्ञाता, सोम (चन्द्र) रस का पान करने वाले, क्षीण पाप लोग स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से यज्ञों द्वारा मेरा पूजन करते हैं। उन पुण्य कर्मों के फल स्वरूप वे देवताओं के राजा इन्द्र के लोक को प्राप्त कर, देवताओं के दिव्य भोगों का भोग करते हैं।

EMen who do pious deeds enjoined by the three Ved, who have tasted nectar and freed themselves from sin, and who wish for heavenly existence through worshipping me by yagya, go to heaven (Indrlok) and enjoy godly pleasures as a reward for their virtuous acts.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥9- 21॥

Hवे उस विशाल स्वर्ग लोक को भोगने के कारण क्षीण पुण्य होने पर फिर से मृत्यु लोक पहुँचते हैं। इस प्रकार कामी (इच्छाओं से भरे) लोग, तीन शीखाओं वाले धर्म (तीन वेदों) का पालन कर, अपनी इच्छाओं को प्राप्त कर बार बार आते जाते हैं।

EWith the gradual wearing out of the merits of their piety, they go back to the mortal world after enjoying the pleasures of great heaven ; and it is thus that they who seek refuge in the desire-oriented action prescribed by the three Ved and covet joy are condemned to repeated death and birth.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥9- 22॥

Hकिसी और का चिन्तन न कर, अनन्य चित्त से जो जन मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य अभियुक्त (सदा मेरी भक्ति से युक्त) लोगों को मैं योग और क्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा – लाभ की प्राप्ति और अलाभ से रक्षा) प्रदान करता हूँ।

EI myself protect the yog of men who abide in me with steady and undeviating faith and who worship me selflessly, constantly remembering me as God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 23
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥9- 23॥

Hजो (अन्य देवताओं के) भक्त अन्य देवताओं का श्रद्धा से पूजन करते हैं, वे भी, हे कौन्तेय, मेरा ही पूजन करते हैं लेकिन अविधि पूर्ण ढँग से।

EAlthough even covetous devotees indeed worship me in worshipping other gods, their worship is against the ordained provision and therefore enveloped by ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 24
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥9- 24॥

Hमैं ही सभी यज्ञों का भोक्ता (भोगने वाला) और प्रभु हूँ। वे मुझे सार तक नहीं जानते, इसी लिये वे गिर पड़ते हैं।

EThey have to undergo rebirth because they are ignorant of the reality that I am the enjoyer as well as the master of all yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 25
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥9- 25॥

Hदेवताओं (के अर्चन) का व्रत रखने वाले देवताओं के पास जाते हैं, पितृ पूजन वाले पितरों को प्राप्त करते हैं, जीवों का पूजन करने वाले जीवों को प्राप्त करते हैं, और मेरी भक्ति करने वाले मुझे ही प्राप्त करते हैं।

EMen who are devoted to gods attain to gods, worshippers of ancestors attain to their ancestors, worshippers of beings attain to the state of beings, and my worshippers attain to me.

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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