🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
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आसुरी व दैवी स्वभाव (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 11 से 15)

आसुरी व दैवी स्वभाव (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 11 से 15)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 11

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥9- 11॥

Hइस मानुषी तन का आश्रय लेने पर (मानव रुप अवतार लेने पर), जो मूर्ख हैं वे मुझे नहीं पहचानते। मेरे परम भाव को न जानते कि मैं इन सभी भूतों का (संसार और प्राणीयों का) महान् ईश्वर हूँ।

EThe deluded who do not know my ultimate being regard me in the human form as but an inferior mortal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 12
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥9- 12॥

Hव्यर्थ आशाओं में बँधे, व्यर्थ कर्मों में लगे, व्यर्थ ज्ञानों से जिनका चित्त हरा जा चुका है, वे विमोहित करने वाली राक्षसी और आसुरी प्रकृति का सहारा लेते हैं।

EThe ignorant are , like evil spirits, afflicted with the property of darkness and so their hopes and actions and knowledge are all futile.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥9- 13॥

Hलेकिन महात्मा लोग, हे पार्थ, दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर मुझे ही अव्यय (विकार हीन) और इस संसार का आदि जान कर, अनन्य मन से मुझे भजते हैं।

EBut, O Parth, they who have found shelter in divine nature and know me as the eternal, imperishable source of all beings, worship me with perfect devotion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 14
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥9- 14॥

Hऍसे भक्त सदा मेरी प्रशंसा (कीर्ति) करते हुये, मेरे सामने नतमस्तक हो और सदा भक्ति से युक्त हो दृढ व्रत से मेरी उपासने करते हैं।

EAlways engaged in the recital of my name and virtues, ever-active to realize me, and constantly offering obeisance to me, devotees with a firm determination worship me with undivided faith.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 15
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥9- 15॥

Hऔर दूसरे कुछ लोग ज्ञान यज्ञ द्वारा मुझे उपासते हैं। अलग अलग रूपों में एक ही देखते हुये, और इन बहुत से रुपों को ईश्वर का विश्वरूप ही देखते हुये।

EWhile some worship me by gyan-yagya as the allencompassing Supreme Spirit with the feeling that I am all, some worship me with a sense of identity, some with a sense of being separate from me (regarding me as master and themselves as servants), while yet others worship me in many a different fashion.

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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