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पुरषोत्तम का विषय (अध्याय 15 शलोक 16 से 20)

पुरषोत्तम का विषय (अध्याय 15 शलोक 16 से 20)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 16

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥15- 16॥

Hइस संसार में दो प्रकार की पुरुष संज्ञायें हैं – क्षर और अक्षऱ (अर्थात जो नश्वर हैं और जो शाश्वत हैं)। इन दोनो प्रकारों में सभी जीव (देहधारी) क्षर हैं और उन देहों में विराजमान आत्मा को अक्षर कहा जाता है।

EThere are two kinds of beings in the world, the mortal and the immortal: whereas the bodies of all beings are destructible, their Souls are said to be imperishable.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥15- 17॥

Hपरन्तु इन से अतिरिक्त एक अन्य उत्तम पुरुष और भी हैं जिन्हें परमात्मा कह कर पुकारा जाता है। वे विकार हीन अव्यय ईश्वर इन तीनो लोकों में प्रविष्ट होकर संपूर्ण संसार का भरण पोषण करते हैं।

EBut higher than both of them is the one who pervades the three worlds to support and sustain all, and who is named the eternal God and Supreme Spirit (Ishwar).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥15- 18॥

Hक्योंकि मैं क्षर (देह धारी जीव) से ऊपर हूँ तथा अक्षर (आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इस लिये मुझे इस संसार में पुरुषोत्तम के नाम से जाना जाता है।

ESince I am supreme by virtue of being beyond both the perishable ( body) and the imperishable (Soul), I am known as the Supreme Being ( Purushottam ) in the world as well as in the Ved.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 19
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥15- 19॥

Hजो अन्धकार से परे मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह ही सब कुछ जानता है और संपूर्ण भावना से हर प्रकार मुझे भजता है, हे भारत।

EThe all-knowing man, who is thus aware of my essence, O Bharat, as the Supreme Being, always worships me with perfect devotion.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 15 शलोक 20
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥15- 20॥

Hहे अनघ (पाप हीन अर्जुन), इस प्रकार मैंने तुम्हें इस गुह्य शास्त्र को सुनाया। इसे जान लेने पर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है, हे भारत।

EI have thus instructed you, O the sinless, in this most subtle of all knowledge because, O Bharat, by knowing its essence a man gains wisdom and accomplishes all his tasks.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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