🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

गुणों की महिमा (अध्याय 18 शलोक 1 से 12)

गुणों की महिमा (अध्याय 18 शलोक 1 से 12)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 1

अर्जुन बोले (Arjun Said):
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥18- 1॥

हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, मैं संन्यास और त्याग (कर्म योग) के सार को अलग अलग जानना चाहता हूँ।

l am curious to learn, O the mighty armed, O Hrishikesh, master of the senses and slayer of demons the principles of relinquishment and of renunciation.

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 2

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥18- 2॥

Hबुद्धिमान ज्ञानी जन कामनाओं से उत्पन्न हुये कर्मों के त्याग को सन्यास समझते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग (कर्म योग) कहते हैं।

EWhereas numerous scholars use renunciation for the giving up of coveted deeds many others of mature judgement use relinquishment to name the abnegation of the fruits of all action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥18- 3॥

Hकुछ मुनि जन कहते हैं की सभी कर्म दोषमयी होने के कारण त्यागने योग्य हैं। दूसरे कहते हैं की यज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये।

EWhile many erudite men insist that since all actions are vile they ought to be forsaken, other scholars proclaim that deeds such as yagya, charity, and penance ought not to be forsaken.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः॥18- 4॥

Hकर्मों के त्याग के विषय में तुम मेरा निश्चय सुनो हे भरतसत्तम। हे पुरुषव्याघ्र, त्याग को तीन प्रकार का बताया गया है।

EListen, O the best of Bharat, to my notion of renunciation and of how, O the unmatched among men, this renunciation is said to be of three kinds.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥18- 5॥

Hयज्ञ, दान और तप कर्मों का त्याग करना उचित नहीं है – इन्हें करना चाहिये। यज्ञ, दान और तप मुनियों को पवित्र करते हैं।

ERather than forsaking them, deeds such as yagya, charity, and penance ought certainly to be undertaken as a duty, for yagya, charity, and penance are deeds that redeem men of wisdom.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥18- 6॥

Hपरन्तु ये कर्म (यज्ञ दान तप कर्म) भी संग त्याग कर तथा फल की इच्छा त्याग कर करने चाहिये, केवल अपना कर्तव्य जान कर। यह मेरा उत्तम निश्चय है।

EIt is my considered belief, O Parth, that these deeds as also all others ought certainly to be accomplished after forsaking attachment and desire for the fruits of labour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥18- 7॥

Hनियत कर्म का त्याग करना उचित नहीं हैं। मोह के कारण कर्तव्य कर्म का त्याग करना तामसिक कहा जाता है।

EAnd, since the requisite action ought not to be abandoned, forsaking it out of some misconception is deemed as renunciation of the nature of ignorance (tamas).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥18- 8॥

Hशरीर को कष्ट देने के भय से कर्म को दुख मानते हुये उसे त्याग देने से मनुष्य को उस त्याग का फल प्राप्त नहीं होता। ऐसे त्याग को राजसिक त्याग कहा जाता है।

EHe who rashly foregoes action under the assumption that all of it is grievous, or out of fear of physical suffering, is deprived of the merits of his relinquishment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥18- 9॥

Hहे अर्जुन, जिस नियत कार्य को कर्तव्य समझ कर किया जाये, संग को त्याग कर तथा फल को मन से त्याग कर, ऐसे त्याग को सातविक माना जाता है।

EOnly that relinquishment is esteemed righteous, O Arjun, which is ordained and practised with the conviction that doing it after having forsaken attachment and fruits of labour is a moral commitment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥18- 10॥

Hजो मनुष्य न अकुशल कर्म से द्वेष करता है और न ही कुशल कर्म के प्रति खिचता है (अर्थात न लाभदायक फल की इच्छा करता है और न अलाभ के प्रति द्वेष करता है), ऐसा त्यागी मनुष्य सत्त्व में समाहित है, मेधावी (बुद्धिमान) है और संशय हीन है।

EGifted with flawless moral excellence and freedom from doubt, one who neither abhors deeds that are unpropitious nor is enamoured of those that are propitious is wise and self-denying.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥18- 11॥

Hदेहधारीयों के लिये समस्त कर्मों का त्याग करना सम्भव नहीं है। परन्तु जो कर्मों के फलों का त्याग करता है, वही वास्तव में त्यागी है।

ESince the abandonment of all action by an embodied being is impossible, the one who has given up the fruits of action is credited with having practised relinquishment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥18- 12॥

Hकर्म का तीन प्रकार का फल हो सकता है – अनिष्ट (बुरा), इष्ट (अच्छा अथवा प्रिय) और मिला-जुला (दोनों)। जन्होंने कर्म के फलों का त्याग नहीं किया, उन्हें वे फल मृत्यु के पश्चात भी प्राप्त होते हैं, परन्तु उन्हें कभी नहीं जिन्होंने उन का त्याग कर दिया है।

EWhereas the triple returns-good, bad, and mixed-of covetous people’s actions, issue forth even after death, the actions of people who have renounced all, do not ever bear any fruits.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏