🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

प्रकृति व पुरुष वर्णन (अध्याय 13 शलोक 19 से 34)

प्रकृति व पुरुष वर्णन (अध्याय 13 शलोक 19 से 34)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 19

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥13- 19॥

Hतुम प्रकृति और पुरुष दोनो की ही अनादि (जन्म रहित) जानो। और विकारों और गुणों को तुम प्रकृति से उत्पन्न हुआ जानो।

EBe it known to you that both nature and Soul are without beginning and end, and also that maladies such as attachment, revulsion, and all the objects that are possessed of the three properties are born from nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 20
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥13- 20॥

Hकार्य के साधन और कर्ता होने की भावना में प्रकृति को कारण बताया जाता है। और सुख दुख के भोक्ता होने में पुरुष को उसका कारण कहा जाता है।

EWhereas nature is said to be the begetter of deed and doer, the Soul is said to be begetter of the experience of pleasure and pain.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 21
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‌क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥13- 21॥

Hयह पुरुष (आत्मा) प्रकृति में स्थित हो कर प्रकृति से ही उत्पन्न हुये गुणों को भोक्ता है। इन गुणों से संग (जुडा होना) ही पुरुष का सद और असद योनियों में जन्म का कारण है।

EThe nature-based Soul experiences nature-born objects which are characterized by the three properties and it is association with these properties that is the cause of his birth in higher or lower forms.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 22
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥13- 22॥

Hयह पुरुष (जीव आत्मा) इस देह में स्थित होकर देह के साथ संग करता है इसलिये इसे उपद्रष्टा कहा जाता है, अनुमति देता है इसलिये इसे अनुमन्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का पालन पोषण करने वाला समझने के कारण इसे भर्ता कहा जा सकता है, और देह को भोगने के कारण भोक्ता कहा जा सकता है, स्वयं को देह का स्वामि समझने के कारण महेष्वर कहा जा सकता है। लेकिन स्वरूप से यह परमात्मा तत्व ही है अर्थात इस का देह से कोई संबंध नहीं।

EAlthough residing in the body, the Soul is transcendental and said to be the witness, the granter, the enjoyer, and the great God and Supreme Spirit.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 23
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥13- 23॥

Hजो इस प्रकार पुरुष और प्रकृति तथा प्रकृति में स्थित गुणों के भेद को जानता है, वह मनुष्य सदा वर्तता हुआ भी दोबारा फिर मोहित नहीं होता।

EIn whatever manner he conducts himself, the man who knows the truth of the Soul and nature with its three properties is never born again.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 24
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥13- 24॥

Hकोई ध्यान द्वारा अपने ही आत्मन से अपनी आत्मा को देखते हैं, अन्य सांख्य ज्ञान द्वारा अपनी आत्मा का ज्ञान प्राप्त करते हैं, तथा अन्य कई कर्म योग द्वारा।

EWhile some perceive the Supreme Spirit in their heart by contemplation with their refined mind, some others know him by the yog of knowledge, and yet others by the yog of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 25
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥13- 25॥

Hलेकिन दूसरे कई इसे न जानते हुये भी जैसा सुना है उस पर विश्वास कर, बताये हुये की उपासना करते हैं। वे श्रुति परायण (सुने हुये पर विश्वास करते और उसका सहारा लेते) लोग भी इस मृत्यु संसार को पार कर जाते हैं।

EBut ignorant of these ways, there are yet others who worship by just learning the truth from accomplished sages and, relying upon what they hear, they also doubtlessly steer across the gulf of the mortal world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 26
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥13- 26॥

Hहे भरतर्षभ, जो भी स्थावर यां चलने-फिरने वाले जीव उत्पन्न होते हैं, तुम उन्हें इस क्षेत्र (शरीर तथा उसके विकार आदि) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से ही उत्पन्न हुआ समझो।

ERemember, O the best of Bharat, that whatever animate or inanimate being exists is born from the coming together of the insentient kshetr and the sentient kshetragya,
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 27
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥13- 27॥

Hपरमात्मा सभी जीवों में एक से स्थित हैं। विनाश को प्राप्त होते इन जीवों में जो अविनाशी उन परमात्मा को देखता है, वही वास्तव में देखता है।

EHe alone knows the truth who steadily sees the imperishable God in all animate and inanimate beings that are destructible.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 28
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥13- 28॥

Hहर जगह इश्वर को एक सा अवस्थित देखता हुआ जो मनुष्य सर्वत्र समता से देखता है, वह अपने ही आत्मन द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परम पति को प्राप्त करता है।

EHe achieves the supreme goal because, evenly perceiving the existence of the identical God in all beings, he does not himself degrade his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 29
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥13- 29॥

Hजो प्रकृति को ही हर प्रकार से सभी कर्म करते हुये देखता है, और स्वयं को अकर्ता (कर्म न करने वाला) जानता है, वही वास्तव में सत्य देखता है।

EAnd that man knows the truth who regards all action as performed by nature and his own Soul as a non-doer.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 30
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा॥13- 30॥

Hजब वह इन सभी जीवों के विविध भावों को एक ही जगह स्थित देखता है (प्रकृति में) और उसी एक कारण से यह सारा विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

EHe realizes God when he sees the whole variety of beings as resting upon and as an extension of the will of that one Supreme Spirit.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 31
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥13- 31॥

Hहे कौन्तेय, जीवात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण विकारहीन (अव्यय) परमात्मा तत्व ही है। यह शरीर में स्थित होते हुये भी न कुछ करती है और न ही लिपती है।

EAlthough embodied, the imperishable Supreme Spirit is neither a doer nor tainted because, O son of Kunti, he is without beginning or end and transcending all properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 32
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥13- 32॥

Hजैसे हर जगह फैला आकाश सूक्षम होने के कारण लिपता नहीं है उसी प्रकार हर जगह अवस्थित आत्मा भी देह से लिपती नहीं है।

EAs the all-extensive sky is unsullied because of its subtlety, even so the embodied Soul is neither a doer nor tainted because he is beyond all the properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 33
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥13- 33॥

Hजैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार हे भारत, क्षेत्री (आत्मा) भी क्षेत्र को प्रकाशित कर देती है।

EThe Soul illuminates the whole kshetr just as the one sun lights up the entire world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 34
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥13- 34॥

Hइस पर्कार जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच में ज्ञान दृष्टि से भेद देखते हैं और उन को अलग अलग जानते हैं, वे इस प्रकृति से विमुक्त हो परम गति को प्राप्त करते हैं।

EThey who have thus perceived the distinction between kshetr and kshetragya, and the way of liberation from the maladies of nature, with the eye of wisdom attain to the Supreme Spirit.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏