🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

ज्ञान सहित क्षेत्र (अध्याय 13 शलोक 1 से 18)

ज्ञान सहित क्षेत्र (अध्याय 13 शलोक 1 से 18)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 1

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥13- 1॥

Hइस शरीर को, हे कौन्तेय, क्षेत्र कहा जाता है। और ज्ञानी लोग इस क्षेत्र को जो जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

EThe Lord said, This body is, O son of Kunti, a battlefield (kshetr) and the men who know it (kshetragya) are called wise because they have grown spiritually dexterous by perceiving its essence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 2
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥13- 2॥

Hसभी क्षोत्रों में तुम मुझे ही क्षेत्रज्ञ जानो हे भारत (सभी शरीरों में मैं क्षेत्रज्ञ हूँ)। इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान (समझ) ही वास्तव में ज्ञान है, मेरे मत से।

EAnd be it known to you, O Bharat, that I am the all-knowing Self (kshetragya) in all spheres; and to me awareness of the reality of kshetr and kshetragya, of mutable nature and the Self, is knowledge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 3
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥13- 3॥

Hवह क्षेत्र जो है और जैसा है, और उसके जो विकार (बदलाव) हैं, और जिस से वो उत्पन्न हुआ है, और वह क्षेत्रज्ञ जो है, और जो इसका प्रभाव है, वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो।

EListen to me briefly on the whence and what of that sphere and its variations and properties, as well on the kshetragya and his abilities.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 4
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥13- 4॥

Hऋषियों ने बहुत से गीतों में और विविध छन्दों में पृथक पृथक रुप से इन का वर्णन किया है। तथा सोच समझ कर संपूर्ण तरह निश्चित कर के ब्रह्म सूत्र के पदों में भी इसे बताया गया है।

EThis has (also) been said in various distinct ways by sages in different scriptural verses and well-reasoned, definitive aphorisms on the knowledge of the Supreme Spirit (Brahmsutr).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 5, 6
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥13- 5॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥13- 6॥

Hमहाभूत (मूल प्राकृति), अहंकार (मैं का अहसास), बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति (गुण), दस इन्द्रियाँ (पाँच इन्द्रियां और मन और कर्म अंग), और पाँचों इन्द्रियों के विषय। इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघ (देह समूह), चेतना, धृति (स्थिरता) – यह संक्षेप में क्षेत्र और उसके विकार बताये गये हैं

ESpeaking briefly, mutable physical body is the aggregate of the five elements, ego, intellect, even the unmanifest, the ten sense organs, mind and the five objects of sense, as well as desire, malice, pleasure and pain, and intelligence and fortitude.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 7
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥13- 7॥

Hअभिमान न होना (स्वयं के मान की इच्छा न रखना), झुठी दिखावट न करना, अहिंसा (जीवों की हिंसा न करना), शान्ति, सरलता, आचार्य की उपासना करना, शुद्धता (शौच), स्थिरता और आत्म संयम।

EAbsence of pride and arrogant conduct, disinclination to do injury to anyone, forgiveness, integrity of thought and speech, devoted service to the teacher, outward as well as inner purity, moral firmness, restraint of the body along with the mind and senses,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 8
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥13- 8॥

Hइन्द्रियों के विषयों के प्रति वैराग्य (इच्छा शून्यता), अहंकार का अभाव, जन्म मृत्यु जरा (बुढापे) और बिमारी (व्याधि) के रुप में जो दुख दोष है उसे ध्यान में रखना (अर्थात इन से मुक्त होने का प्रयत्न करना)।

EDisinterest in pleasures of both the world and heaven, absence of ego, constant reflection over the maladies of birth, death, old age, sickness, and pain,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 9
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥13- 9॥

Hआसक्ति से मुक्त रहना (संग रहित रहना), पुत्र, पत्नी और गृह आदि को स्वयं से जुड़ा न देखना (ऐकात्मता का भाव न होना), इष्ट (प्रिय) और अनिष्ट (अप्रिय) का प्राप्ति में चित्त का सदा एक सा रहना।

EDetachment from son, wife, home and the like, freedom from infatuation, bearing with both the pleasant and the unpleasant with equanimity,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 10
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥13- 10॥

Hमुझ में अनन्य अव्यभिचारिणी (स्थिर) भक्ति होना, एकान्त स्थान पर रहने का स्वभाव होना, और लोगों से घिरे होने को पसंद न करना।

EUnswerving devotion to me with a single-minded concern for yog, fondness of living in sequestered places, distaste for human society,…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥13- 11॥

Hसदा अध्यात्म ज्ञान में लगे रहना, तत्त्व (सार) का ज्ञान होना, और अपनी भलाई (अर्थ अर्थात भगवात् प्राप्ति जिसे परमार्थ – परम अर्थ कहा जाता है) को देखना, इस सब को ज्ञान कहा गया है, और बाकी सब अज्ञान है।

EConstantly resting in the awareness that is called adhyatm and perception of the Supreme Spirit who is the end of realization of truth are all knowledge and whatever is contrary to them is ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 12
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥13- 12॥

Hजो ज्ञेय है (जिसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये), मैं उसका वर्णन करता हूँ, जिसे जान कर मनुष्य अमरता को प्राप्त होता है। वह (ज्ञेय) अनादि है (उसका कोई जन्म नहीं है), परम ब्रह्म है। न उसे सत कहा जाता है, न असत् कहा जाता है (वह इन संज्ञाओं से परे है)।

EI shall discourse (to you) well upon the God without a beginning or end, who is worthy of being known and after knowing whom the stuff of immortality is gained and who is said to be neither a being nor a non-being|
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 13
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥13- 13॥

Hहर ओर हर जगह उसके हाथ और पैर हैं, हर ओर हर जगह उसके आँखें और सिर तथा मुख हैं, हर जगह उसके कान हैं। वह इस संपूर्ण संसार को ढक कर (हर जगह व्याप्त हो) विराजमान है।

EHe has hands and feet, eyes, heads, mouths, and ears on all sides, because he exists pervading all in the world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 14
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥13- 14॥

Hवह सभी इन्द्रियों से वर्जित होते हुये सभी इन्द्रियों और गुणों को आभास करता है। वह असक्त होते हुये भी सभी का भरण पोषण करता है। निर्गुण होते हुये भी सभी गुणों को भोक्ता है।

EKnowing the objects of all senses he is yet without senses; unattached to and beyond the properties of nature he is yet the sustainer of all; and he is also the one into whom all the properties merge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 15
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥13- 15॥

Hवह सभी चर और अचर प्राणियों के बाहर भी है और अन्दर भी। सूक्षम होने के कारण उसे देखा नहीं जा सकता। वह दुर भी स्थित है और पास भी।

EExisting in all animate and inanimate beings, he is both animate and inanimate; he is also unmanifest because he is so subtle, and both distant and close.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 16
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥13- 16॥

Hसभी भूतों (प्राणियों) में एक ही होते हुये भी (अविभक्त होते हुये भी) विभक्त सा स्थित है। वहीं सभी प्राणियों का पालन पोषण करने वाला है, वहीं ज्ञेयं (जिसे जाना जाना चाहिये) है, ग्रसिष्णु है, प्रभविष्णु है।

EThe Supreme Spirit who is worth knowing, and who appears to be different in different beings although he is one and undivided, is the begetter, sustainer, and destroyer of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 17
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥13- 17॥

Hसभी ज्योतियों की वही ज्योति है। उसे तमसः (अन्धकार) से परे (परम) कहा जाता है। वही ज्ञान है, वहीं ज्ञेय है, ज्ञान द्वारा उसे प्राप्त किया जाता है। वही सब के हृदयों में विराजमान है।

EThe light among lights and said to be beyond darkness, that God, the embodiment of knowledge, worthy of being known, and attainable only through knowledge, dwells in the hearts of all.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 13 शलोक 18
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥13- 18॥

Hइस प्रकार तुम्हें संक्षेप में क्षेत्र (यह शरीर आदि), ज्ञान और ज्ञेय (भगवान) का वर्णन किया है। मेरा भक्त इन को समझ जाने पर मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है।

EKnowing the truth of what has been briefly said of kshetr, knowledge, and of God, who ought to be known, my devotee attains to my state.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏