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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता03. कर्मयोगज्ञानी व अज्ञानी के लक्षण (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 25 से 36)

ज्ञानी व अज्ञानी के लक्षण (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 25 से 36)

ज्ञानी व अज्ञानी के लक्षण (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 25 से 36)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 25

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥3- 25॥

H जैसे अज्ञानी लोग कर्मों से जुड़ कर कर्म करते हैं वैसे ही ज्ञानमन्दों को चाहिये कि कर्म से बिना जुड़े कर्म करें। इस संसार चक्र के लाभ के लिये ही कर्म करें।

E As the ignorant act with a feeling of attachment to their actions, even so, O Bharat, the wise ought to act for the presentation of the (divinely) established world-order.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥3- 26॥

H जो लोग कर्मो के फलों से जुड़े है, कर्मों से जुड़े हैं ज्ञानमंद उनकी बुद्धि को न छेदें। सभी कामों को कर्मयोग बुद्धि से युक्त होकर समता का आचरण करते हुऐ करें॥

E Rather than confusing and undermining the faith of the ignorant who are attached to action, the wise man should prompt them to dwell in God and act well as he himself does.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 27
 शलोक 27
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥3- 27॥

H सभी कर्म प्रकृति में स्थित गुणों द्वारा ही किये जाते हैं। लेकिन अहंकार से विमूढ हुआ मनुष्य स्वय्म को ही कर्ता समझता है॥

E Although all action is caused by the properties of nature, the man with an egoistic and deluded mind presumes that he himself is the doer.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥3- 28॥

H हे महाबाहो, गुणों और कर्मों के विभागों को सार तक जानने वाला, यह मान कर की गुण ही गुणों से वर्त रहे हैं, जुड़ता नहीं॥

E But the wise man, who is aware of different spheres of the properties of nature in the form of mind and senses as well as of their action upon objects, is not a prey to attachment, O the mighty-armed, because he knows that the mind and senses (gun) dwell upon objects of perception (gun).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 29
प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥3- 29॥

H प्रकृति के गुणों से मूर्ख हुऐ, गुणों के कारण हुऐ उन कर्मों से जुड़े रहते है। सब जानने वाले को चाहिऐ कि वह अधूरे ज्ञान वालों को विचलित न करे॥

E They ought not to undermine the faith of the deluded who are unaware of the truth, because they are enamoured of the constituents of matter and so attached to senses and their functions.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 30
 शलोक 30
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥3- 30॥

H सभी कर्मों को मेरे हवाले कर, अध्यात्म में मन को लगाओ। आशाओं से मुक्त होकर, “मै” को भूल कर, बुखार मुक्त होकर युद्ध करो॥

E So, O Arjun, contemplate the Self, surrender all your action to me, abandon all desire, pity, and grief, and be ready to fight.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 31
यह में मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥3- 31॥

H मेरे इस मत को, जो मानव श्रद्धा और बिना दोष निकाले सदा धारण करता है और मानता है, वह कर्मों से मु्क्ती प्राप्त करता है॥

E Unquestioning and devoted men who always act according to this precept of mine are liberated from action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 32
यह त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति में मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥3- 32॥

H जो इसमें दोष निकाल कर मेरे इस मत का पालन नहीं करता, उसे तुम सारे ज्ञान से वंचित, मूर्ख हुआ और नष्ट बुद्धी जानो॥

E Know that skeptical men, who do not act in keeping with this precept of mine because they are devoid of knowledge and discrimination, are doomed to misery.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥3- 33॥

H सब वैसा ही करते है जैसी उनका स्वभाव होता है, चाहे वह ज्ञानवान भी हों। अपने स्वभाव से ही सभी प्राणी होते हैं फिर सयंम से क्या होगा॥

E Since all beings are constrained to act in conformity with their natural disposition and the wise man also strives accordingly, of what avail can violence (with nature) be?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥3- 34॥

H इन्द्रियों के लिये उन के विषयों में खींच और घृणा होती है। इन दोनो के वश में मत आओ क्योंकि यह रस्ते के रुकावट हैं॥

E Do not be ruled by attachment and aversion, because both of them are the great enemies that obstruct you on the way to good.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥3- 35॥

H अपना काम ही अच्छा है, चाहे उसमे कमियाँ भी हों, किसी और के अच्छी तरह किये काम से। अपने काम में मृत्यु भी होना अच्छा है, किसी और के काम से चाहे उसमे डर न हो॥

E Although inferior (in merit), one’s own dharm is the best and even meeting with death in it brings good, whereas a dharm other than one’s own, though well observed, generates only fear.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 36
अर्जुन बोले (Arjun Said):

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥3- 36॥

H लेकिन, हे वार्ष्णेय, किसके जोर में दबकर पुरुष पाप करता है, अपनी मरजी के बिना भी, जैसे कि बल से उससे पाप करवाया जा रहा हो॥

E What, O Varshneya (Krishn), is that which drives man, forced against his will as it were and with reluctance, to act impiously?

 

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