Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता07. ज्ञानविज्ञानयोगदेवताओं की पूजा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 20 से 23)

देवताओं की पूजा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 20 से 23)

देवताओं की पूजा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 20 से 23)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 20

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥7- 20॥

H इच्छाओं के कारण जिन का ज्ञान छिन गया है, वे अपने अपने स्वभाव के अनुसार, नीयमों का पालन करते हुऐ अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।

E Driven by the properties of their nature, they who fall from knowledge desire worldly pleasures and, in imitation of the prevailing customs, worship other gods instead of theone single God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥7- 21॥

H जो भी मनुष्य जिस जिस देवता की भक्ति और श्रद्धा से अर्चना करने की इच्छा करता है, उसी रूप (देवता) में मैं उसे अचल श्रद्धा प्रदान करता हूँ।

E It is I who bestow steadiness on the faith of covetous worshippers according to the nature of the gods they worship.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥7- 22॥

H उस देवता के लिये (मेरी ही दी) श्रद्धा से युक्त होकर वह उसकी अराधना करता है और अपनी इच्छा पूर्ती प्राप्त करता है, जो मेरे द्वारा ही निरधारित की गयी होती है।

E Possessing this strengthened faith, the worshipper devotes himself to his chosen deity with devotion and, through this undoubtedly achieves the enjoyment of desired pleasures which are also appointed by my laws.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥7- 23॥

H अल्प बुद्धि वाले लोगों को इस प्रकार प्रप्त हुऐ यह फल अन्तशील हैं। देवताओं का यजन करने वाले देवताओं के पास जाते हैं लेकिन मेरा भक्त मुझे ही प्राप्त करता है।

E But the rewards of these deluded men are finite because they only attain to the gods they worship, whereas the man who worships me howsoever he does it – realizes me.

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