Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता07. ज्ञानविज्ञानयोगसगुण ब्रह्म का ज्ञान (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 1 से 12)

सगुण ब्रह्म का ज्ञान (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 1 से 12)

सगुण ब्रह्म का ज्ञान (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 1 से 12)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 1

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥7- 1॥

H मुझ मे लगे मन से, हे पार्थ, मेरा आश्रय लेकर योगाभ्यास करते हुऐ तुम बिना शक के मुझे पूरी तरह कैसे जान जाओगे वह सुनो।

E Listen, O Parth, to how by taking refuge in me and practising yog with devotion, you shall know me beyond any doubt as the all-perfect Soul in all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥7- 2॥

H मैं तुम्हे ज्ञान और अनुभव के बारे सब बताता हूँ, जिसे जान लेने के बाद और कुछ भी जानने वाला बाकि नहीं रहता।

E I shall fully teach you this knowledge as well as the allpervasive action that results from realization of God (vigyan), after which there remains nothing better in the world to know.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥7- 3॥

H हजारों मनुष्यों में कोई ही सिद्ध होने के लिये प्रयत्न करता है। और सिद्धि के लिये प्रयत्न करने वालों में भी कोई ही मुझे सार तक जानता है।

E Hardly does one man among thousands strive to know me and hardly does one among the thousands who strive for this know my essence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥7- 4॥

H भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – यह भिन्न भिन्न आठ रूपों वाली मेरी प्रकृति है।

E I am the creator of all nature with its eight divisionsearth, water, fire, wind, ether, mind, intellect, and ego.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥7- 5॥

H यह नीचे है। इससे अलग मेरी एक और प्राकृति है जो परम है – जो जीवात्मा का रूप लेकर, हे महाबाहो, इस जगत को धारण करती है।

E This nature, O the mighty-armed, is the lower, insensate nature, but against it there is my conscious, living nature which animates the whole world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥7- 6॥

H यह दो ही वह योनि हैं जिससे सभी जीव संभव होते हैं। मैं ही इस संपूर्ण जगत का आरम्भ हूँ औऱ अन्त भी।

E Know that all beings arise from these two natures and  that I am both the creator and the end of whole world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 7
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥7- 7॥

H मुझे छोड़कर, हे धनंजय, और कुछ भी नहीं है। यह सब मुझ से वैसे पुरा हुआ है जैसे मणियों में धागा पुरा होता है।

E There is, O Dhananjay, not even one object other than me, and the whole world is linked up with me like the pearls of a necklace.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥7- 8॥

H मैं पानी का रस हूँ, हे कौन्तेय, चन्द्र और सूर्य की रौशनी हूँ, सभी वेदों में वर्णित ॐ हूँ, और पुरुषों का पौरुष हूँ।

E O Arjun, I am that which makes water liquescent, the radiance in the sun and the moon, the sacred syllable OM, the word’s echo (Shabd)5 in the ether, and I am also the manliness in men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥7- 9॥

H पृथवि की पुन्य सुगन्ध हूँ और अग्नि का तेज हूँ। सभी जीवों का जीवन हूँ, और तप करने वालों का तप हूँ।

E I am the fragrance in the earth, the flame in fire, the Soul that animates all beings, and the penance of ascetics.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥7-10॥

H हे पार्थ, मुझे तुम सभी जीवों का सनातन बीज जानो। बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ और तेजस्वियों का तेज मैं हूँ।

E Since I am also the intellect in wise men and the magnificence of men of glory, know you, O Arjun, that I am the eternal fountainhead of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥7- 11॥

H बलवानों का वह बल जो काम और राग मुक्त हो वह मैं हूँ। प्राणियों में वह इच्छा जो धर्म विरुद्ध न हो वह मैं हूँ हे भारत श्रेष्ठ।

E I am, O the best of Bharat, the selfless power of the strong and I, too, am th aspiration for realization in all beings that is never hostile to God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥7- 12॥

H जो भी सत्तव, रजो अथवा तमो गुण से होता है उसे तुम मुझ से ही हुआ जानो, लेकिन मैं उन में नहीं, वे मुझ में हैं।

E And know that although all the properties of nature tamas, rajas and sattwa) have arisen from me, they neither dwell in me nor do I dwell in them

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