🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

भगवत्प्राप्ति की विधि (अध्याय 14 शलोक 9 से 27)

भगवत्प्राप्ति की विधि (अध्याय 14 शलोक 9 से 27)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 9

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत॥14- 9॥

Hसत्त्व सुख को जन्म देता है, रजो गुण कर्मों (कार्यों) को, हे भारत। लेकिन तम गुण ज्ञान को ढक कर प्रमाद (अज्ञानता, मुर्खता) को जन्म देता है।

EWhereas the property of sattwa motivates one to joy, rajas prompts to action, and tamas veils knowledge and drives one to carelessness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 10
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥14- 10॥

Hहे भारत, रजो गुण और तमो गुण को दबा कर सत्त्व बढता है, सत्त्व और तमो गुण को दबा कर रजो गुण बढता है, और रजो और सत्त्व को दबाकर तमो गुण बढता है।

EAnd, O Bharat, (just as) sattwa grows by overcoming the properties of rajas and tamas, tamas grows by overpowering rajas and sattwa, and the property of rajas grows by suppressing tamas and sattwa.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥14- 11॥

Hजब देह के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है और ज्ञान बढता है, तो जानना चाहिये की सत्त्व गुण बढा हुआ है।

EWhen the mind and senses are suffused with the light of knowledge and consciousness, it should be taken as a sign of the growing strength of sattwa.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥14- 12॥

Hहे भरतर्षभ, जब रजो गुण की वृद्धि होती है तो लोभ प्रवृत्ति और उद्वेग से कर्मों का आरम्भ, स्पृहा (अशान्ति) होते हैं।

EWhen the property of rajas is ascendant, O the best of Bharat, greed, worldly inclination, the tendency to undertake action, restlessness, and desire for sensual pleasures arise.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥14- 13॥

Hहे कुरुनन्दन। तमो गुण के बढने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति (न करने की इच्छा), प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।

EWhen there is an upsurge of tamas, O Kurunandan, darkness, disinclination to duty which ought to be done, carelessness, and tendencies that engender infatuation arise.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥14- 14॥

Hजब देहभृत सत्त्व के बढे होते हुये मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम ज्ञानमंद लोगों के अमल (स्वच्छ) लोकों को जाता है।

EIf the Soul departs when the property of sattwa is dominant, it attains to the pure worlds of the virtuous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥14- 15॥

Hरजो गुण की बढोती में जब जीव मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह कर्मों से आसक्त जीवों के बीच जन्म लेता है। तथा तमो गुण की वृद्धि में जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह मूढ योनियों में जन्म लेता है।

EIf he meets with death when rajas is presiding, he is born as (one of ) humans who are attached to action; and he is born in the form of unintelligent beings if he leaves the body when tamas is prevailing.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 16
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥14- 16॥

Hसात्विक (सत्त्व गुण में आधारित) अच्छे कर्मों का फल भी निर्मल बताया जाता है, राजसिक कर्मों का फल लेकिन दुख ही कहा जाता है, और तामसिक कर्मों का फल अज्ञान ही है।

EWhile righteousness is said to be the pure outcome of action that is governed by sattwa, the outcome of rajas is sorrow, and the outcome of tamas is ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 17
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥14- 17॥

Hसत्त्व ज्ञान को जन्म देता है, रजो गुण लोभ को। तमो गुण प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न करता है।

EKnowledge arises from the property of sattwa, greed beyond any doubt from rajas, and carelessness, delusion, and ignorance from tamas.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 18
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥14- 18॥

Hसत्त्व में स्थित प्राणि ऊपर उठते हैं, रजो गुण में स्थित लोग मध्य में ही रहते हैं (अर्थात न उनका पतन होता है न उन्नति), लेकिन तामसिक जघन्य गुण की वृत्ति में स्थित होने के कारण (निंदनीय तमो गुण में स्थित होने के कारण) नीचें को गिरते हैं (उनका पतन होता है)।

EWhereas they who dwell in sattwa ascend to higher worlds, they who sojourn in rajas remain in the middle (the world of men), and they who abide in the meanest of properties tamas are doomed to the lowest state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 19
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥14- 19॥

Hजब मनुष्य गुणों के अतिरिक्त और किसी को भी कर्ता नहीं देखता समझता (स्वयं और दूसरों को भी अकर्ता देखता है), केवल गुणों को ही गर्ता देखता है, और स्वयं को गुणों से ऊपर (परे) जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त करता है।

EWhen the Soul (that is a mere witness) does not see anyone besides the three properties as doer and when he knows the essence of the Supreme Spirit who is beyond these properties, he attains to my state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 20
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14- 20॥

Hइन तीनों गुणों को, जो देह की उत्पत्ति का कारण हैं, लाँघ कर देही अर्थात आत्मा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दुखों से विमुक्त हो अमृत का अनुभव करता है।

ETranscending the properties that are the germ of the gross, corporal body and liberated from the miseries of birth, death, and old age, the Soul achieves the ultimate bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 21

अर्जुन जी बोले (Arjun Said):

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14- 21॥

Hहे प्रभो, इन तीनो गुणों से अतीत हुये मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं। उस का क्या आचरण होता है। वह तीनों गुणो से कैसे पार होता है।

E(Tell me), O Lord, the attributes of the man who has risen above the three properties, his manner of life, and the way by which he transcends the three properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 22

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14- 22॥

Hहे पाण्डव, तानों गुणों से ऊपर उठा महात्मा न प्रकाश (ज्ञान), न प्रवृत्ति (रजो गुण), न ही मोह (तमो गुण) के बहुत बढने पर उन से द्वेष करता है और न ही लोप हो जाने पर उन की इच्छा करता है।

EThe man, O Pandav, who neither abhors radiance, inclination to action, and attachment that are generated respectively by the operations of sattwa, rajas, and tamas when he is involved in them, nor aspires for them when he is liberated;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 23
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14- 23॥

Hजो इस धारणा में स्थित रहता है की गुण ही आपस में वर्त रहे हैं, और इसलिये उदासीन (जिसे कोई मतलब न हो) की तरह गुणों से विचलित न होता, न ही उन से कोई चेष्ठा करता है।

E(And) who, like a dispassionate onlooker, is unmoved by the properties and is steady and unshaken by dint of his realization that these properties of nature but abide in themselves;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 24
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14- 24॥

Hसुख और दुख में एक सा, अपने आप में ही स्थित जो मिट्टि, पत्थर और सोने को एक सा देखता है। जो प्रिय और अप्रिय की एक सी तुलना करता है, जो धीर मनुष्य निंदा और आत्म संस्तुति (प्रशंसा) को एक सा देखता है।

E(And) who, ever dwelling in his Self, views joy, sorrow, earth, stone, and gold as equal, is patient, and evenly regards the pleasant and the unpleasant, slander and praise;…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥14- 25॥

Hजो मान और अपमान को एक सा ही तोलता है (बराबर समझता है), मित्र और विपक्षी को भी बराबर देखता है। सभी आरम्भों का त्याग करने वाला है, ऐसे महात्मा को गुणातीत (गुणों के अतीत) कहा जाता है।

E(And) who puts up with honour and dishonour, as (also) with friend and foe, with equanimity, and who gives up the undertaking of action is said to have transcended all the properties.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14- 26॥

Hऔर जो मेरी अव्यभिचारी भक्ति करता है, वह इन गुणों को लाँघ कर ब्रह्म की प्राप्ति करने का पात्र हो जाता है।

EAnd the man who serves me with the yog of unswerving devotion overcomes the three properties and secures the state of oneness with God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14- 27॥

Hक्योंकि मैं ही ब्रह्म का, अमृतता का (अमरता का), अव्ययता का, शाश्वतता का, धर्म का, सुख का और एकान्तिक सिद्धि का आधार हूँ (वे मुझ में ही स्थापित हैं)।

EFor I am the one in which the eternal God, immortal life, the imperishable dharm, and the ultimate bliss all (abide).
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏