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तीन गुणों का विस्तार (अध्याय 14 शलोक 5 से 8)

तीन गुणों का विस्तार (अध्याय 14 शलोक 5 से 8)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 5

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥14- 5॥

Hहे माहाबाहो, सत्त्व, रज और तम – प्रकृति से उत्पन्न होने वाले यह तीन गुण अविकारी अव्यय आत्मा को देह में बाँधते हैं।

EThe three nature-born properties (sattwa, rajas, and tamas), O the mighty-armed, bind the imperishable Self to the body.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥14- 6॥

Hहे आनघ (पापरहित), उन में से सत्त्व निर्मल और प्रकाशमयी, पीडा रहित होने के कारण सुख के संग और ज्ञान द्वारा आत्मा को बाँधता है।

EOf the three properties, O the sinless, the purifying and enlightening sattwa binds one to the desire for joy and knowledge.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥14- 7॥

Hतृष्णा (भूख, इच्छा) और आसक्ति से उत्पन्न रजो गुण को तुम रागात्मक जानो। यह देहि (आत्मा) को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है, हे कौन्तेय।

EKnow, O son of Kunti, that the properly of rajas, born from desire and infatuation, binds the Self with attachment to action and its fruits. Rajas, an embodiment of passion, inclines one to action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 14 शलोक 8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥14- 8॥

Hतम को लेकिन तुम अज्ञान से उत्पन्न हुआ जानो जो सभी देहवासीयों को मोहित करता है। हे भारत, वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा आत्मा को बाँधता है।

EAnd, O Bharat, know that the property of tamas, which deludes all beings, arises from ignorance and binds the Soul with carelessness, sloth, and slumber.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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