🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

आसुरी सम्पदा के चिहन् (अध्याय 16 शलोक 6 से 20)

आसुरी सम्पदा के चिहन् (अध्याय 16 शलोक 6 से 20)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 6

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥16- 6॥

Hइस संसार में दो प्रकार के जीव हैं – दैवी प्रकृति वाले और आसुरी प्रकृति वाले। दैवी स्वभाव के बारे में अब तक विस्तार से बताया है। अब आसुरी बुद्धि के विषय में सुनो हे पार्थ।

EThere are in the world, O Parth, two kinds of beings, the pious, on whom I have already dwelt at length, and the devilish of whom you will now hear from me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 7
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥16- 7॥

Hअसुर बुद्धि वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते (अर्थात किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये किस से निवृत्त होना चाहिये, उन्हें इसका आभास नहीं)। न उनमें शौच (शुद्धता) होता है, न ही सही आचरण, और न ही सत्य।

EWanting in inclination to both engage in proper action and avoid improper acts, the demoniacal have neither purity nor the right conduct, nor even truthfulness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥16- 8॥

Hउनके अनुसार यह संसार असत्य और प्रतिष्ठा हीन है (अर्थात इस संसार में कोई दिखाई देने वाले से बढकर सत्य नहीं है और न ही इसका कोई मूल स्थान है) , न ही उनके अनुसार इस संसार में कोई ईश्वर हैं, केवल परस्पर (स्त्रि पुरुष के) संयोग से ही यह संसार उत्पन्न हुआ है, केवल काम भाव ही इस संसार का कारण है।

ESince the world, they say, is unreal, without shelter and God, and created by itself through mutual (male-female) intercourse, what else is it for except physical indulgence?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 9
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥16- 9॥

Hइस दृष्टि से इस संसार को देखते, ऐसे अल्प बुद्धि मनुष्य अपना नाश कर बैठते हैं और उग्र कर्मों में प्रवृत्त होकर इस संसार के अहित के लिये ही प्रयत्न करते हैं।

EDepraved and dim-witted because they hold such a view, these malicious and cruel people are born only to ravage the world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 10
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‌गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥16- 10॥

Hदुर्लभ (असंभव) इच्छाओं का आश्रय लिये, दम्भ (घमन्ड) मान और अपने ही मद में चुर हुये, मोहवश (अज्ञान वश) असद आग्रहों को पकड कर अपवित्र (अशुचि) व्रतों में जुटते हैं।

EPossessed of arrogance, conceit and wantonness, and immersed in insatiable lust, they subscribe to false doctrines out of ignorance and act wickedly.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 11
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥16- 11॥

Hमृत्यु तक समाप्त न होने वालीं अपार चिन्ताओं से घिरे, वे काम उपभोग को ही परम मानते हैं।

EBeset by countless anxieties that stretch right up to death and absorbed in the enjoyment of sensual objects, they are firmly convinced that satisfaction of carnal desires is the highest goal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 12
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥16- 12॥

Hसैंकडों आशाओं के जाल में बंधे, इच्छाओं और क्रोध में डूबे, वे अपनी इच्छाओं और भोगों के लिये अन्याय से कमाये धन के संचय में लगते हैं।

EChained by hundreds of bonds of illusory hopes, and at the mercy of desire and anger, they wrongfully endeavour to store wealth for the satisfaction of their lust.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 13
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥16- 13॥

H‘इसे तो हमने आज प्राप्त कर लिया है, अन्य मनोरथ को भी हम प्राप्त कर लेंगें। इतना हमारे पास है, उस धन भी भविष्य में हमारा हो जायेगा’।

ETheir perpetual thought is: I have gained this today and Ishall have that wish; I have these riches and I shall have more in the future.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥16- 14॥

H‘इस शत्रु तो हमारे द्वारा मर चुका है, दूसरों को भी हम मार डालेंगें। मैं ईश्वर हूँ (मालिक हूँ), मैं सुख सम्रद्धि का भोगी हूँ, सिद्ध हुँ, बलवान हुँ, सुखी हुँ ‘।

EI have slain that enemy and l shall also slay other enemies; I am God and the holder of sovereignty.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 15
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥16- 15॥

H‘मेरे समान दूसरा कौन है। हम यज्ञ करेंगें, दान देंगें और मजा उठायेंगें ‘ – इस प्रकार वे अज्ञान से विमोहित होते हैं।

EThus deluded by ignorance they think: I am wealthy and noble-born. Who can equal me? I shall perform yagya, give alms, and lead a life of bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 16
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥16- 16॥

Hउनका चित्त अनेकों दिशाओं में दौडता हुआ, अज्ञान के जाल से ढका रहता है। इच्छाओं और भोगों से आसक्त चित्त, वे अपवित्र नरक में गिरते जाते हैं।

EMisled in many a way, entangled in the webs of attachment, and inordinately fond of sensual pleasure, they fall into the most defiled hell.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 17
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥16- 17॥

Hअपने ही घमन्ड में डूबे, सवयं से सुध बुध खोये, धन और मान से चिपके, वे केवन ऊपर ऊपर से ही (नाम के लिये ही) दम्भ और घमन्ड में डूबे अविधि पूर्ण ढंग से यज्ञ करते हैं।

EThese conceited persons, intoxicated by vanity and wealth, offer ostentatious sacrifices which are yagya only in name, in violation of scriptural injunction.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 18
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥16- 18॥

Hअहंकार, बल, घमन्ड, काम और क्रोध में डूबे वे सवयं की आत्मा और अन्य जीवों में विराजमान मुझ से द्वेष करते हैं और मुझ में दोष ढूँडते हैं।

ESubservient to vanity, brute force, arrogance, lust and anger, these wicked and degraded persons have a feeling of enmity to me who dwells in them and in all others.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 19
तानहं द्विषतः क्रुरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥16- 19॥

Hउन द्वेष करने वाले क्रूर, इस संसार में सबसे नीच मनुष्यों को मैं पुनः पुनः असुरी योनियों में ही फेंकता हुँ।

EI forever condemn these abhorring, degraded, and cruel persons, the most abject, among mankind, to demoniacal births.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 16 शलोक 20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥16- 20॥

Hउन आसुरी योनियों को प्राप्त कर, जन्मों ही जन्मों तक वे मूर्ख मुझे प्राप्त न कर, हे कौन्तेय, फिर और नीच गतियों को (योनियों अथवा नरकों) को प्राप्त करते हैं।

EInstead of realizing me, O son of Kunti, these ignorant fools, conceived in devilish wombs birth after birth, are doomed to fall yet lower to the most degraded state.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏