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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता01. अर्जुनविषादयोगअर्जुन का दुर्बल ह्रदय (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 1 शलोक 28 से 47)

अर्जुन का दुर्बल ह्रदय (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 1 शलोक 28 से 47)

अर्जुन का दुर्बल ह्रदय (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 1 शलोक 28 से 47)

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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 28

संजय बोले (Sanjay Said):

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

Hइस प्रखार अपने सगे संबन्धियों और मित्रों को युद्ध में उपस्थित देख अर्जुन का मन करुणा पूर्ण हो उठा और उसने विषाद पूर्वक कृष्ण भगवान से यह कहा।

ESeeing all these kinsmen assembled together and overwhelmed by intense pity, he spoke thus in great sorrow:
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 28, 29, 30

अर्जुन बोले (Arjun Said):

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥1-28॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥1-29॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥1-30॥

Hहे कृष्ण, मैं अपने लोगों को युद्ध के लिये तत्पर यहाँ खडा देख रहा हूँ। इन्हें देख कर मेरे अंग ठण्डे पड रहे है, और मेरा मुख सूख रहा है, और मेरा शरीर काँपने लगा है। मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिरने को है, और मेरी सारी त्वचा मानो आग में जल उठी है। मैं अवस्थित रहने में अशक्त हो गया हूँ, मेरा मन भ्रमित हो रहा है।

ESeeing these kith and kin, mustered with the purpose of waging war, O Krishn, my limbs grow weak, my mouth is dry, my body trembles, my hair stands on end, the Gandeev (Arjun’s bow) slips from my hand, my skin is burning all over, I am unable to stand, and my mind is bewildered.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥1-31॥

Hहे केशव, जो निमित्त है उसे में भी मुझे विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि हे केशव, मुझे अपने ही स्वजनों को मारने में किसी भी प्रकार का कल्याण दिखाई नहीं देता।

EI see, O Madhav (Krishn), inauspicious portents, and I can perceive no prefix in the idea of slaughtering kinsmen in the battle.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥1-32॥

Hहे कृष्ण, मुझे विजय, या राज्य और सुखों की इच्छा नहीं है। हे गोविंद, (अपने प्रिय जनों की हत्या कर) हमें राज्य से, या भोगों से, यहाँ तक की जीवन से भी क्या लाभ है।

EI aspire, O Krishn, after neither victory nor a realm and its pleasures for of what avail is sovereignty to us, O Govind (Krishn), or enjoyment, or even life itself?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 33
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥1-33॥

Hजिन के लिये ही हम राज्य, भोग तथा सुख और धन की कामना करें, वे ही इस युद्ध में अपने प्राणों की बलि चढने को त्यार यहाँ अवस्थित हैं।

EThey for whose sake we crave for a kingdom, pleasures, and enjoyments are formed up here, putting at stake both their lives and wealth.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 34, 35
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा॥1-34॥

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥1-35॥

Hगुरुजन, पिता जन, पुत्र, तथा पितामहा, मातुल, ससुर, पौत्र, साले आदि सभी संबन्धि यहाँ प्रस्तुत हैं। हे मधुसूदन। इन्हें हम त्रैलोक्य के राज के लिये भी नहीं मारना चाहेंगें, फिर इस धरती के लिये तो बात ही क्या है, चाहे ये हमें मार भी दें।

ETeachers, uncles, nephews as well as granduncles, maternal uncles, fathers-in-law, grandnephews, brothersin-law, and other kinsmen. Though they might slay me, I yet have no desire to kill them, O Madhusudan22 (Krishn), even for a realm made up of the three worlds, still less for this earth alone.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥1-36॥

Hधृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मार कर हमें भला क्या प्रसन्नता प्राप्त होगी हे जनार्दन। इन आततायिनों को मार कर हमें पाप ही प्राप्त होगा।

EWhat happiness can we have, O Janardan(Krishn), from slaying these sons of Dhritrashtr? Only sin will fall to our lot if we kill even these wicked men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥1-37॥

Hइसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रो तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना हमारे लिये उचित नहीं है। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मार कर हमें किस प्रकार सुख प्राप्त हो सकता है।

ESo it is not for us to kill Dhritrashtr’s sons, for how indeed can we be happy, O Madhav (Krishn), if we slaughter our own kinsmen?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 38, 39
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥1-38॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥1-39॥

Hयद्यपि ये लोग, लोभ के कारण जिनकी बुद्धि हरी जा चुकी है, अपने कुल के ही क्षय में और अपने मित्रों के साथ द्रोह करने में कोई दोष नहीं देख पा रहे। परन्तु हे जनार्दन, हम लोग तो कुल का क्षय करने में दोष देख सकते हैं, हमें इस पाप से निवृत्त क्यों नहीं होना चाहिये (अर्थात इस पाप करने से टलना चाहिये)।

EAlthough, with their minds vitiated by greed, they (the Kaurav) have no awareness of the evil they do in destroying families and in being treacherous to friends, why should we, O Janardan, who know that it is evil to destroy families, not turn away from the sinful act
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥1-40॥

Hकुल के क्षय हो जाने पर कुल के सनातन (सदियों से चल रहे) कुलधर्म भी नष्ट हो जाते हैं। और कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर सभी प्रकार के अधर्म बढने लगते हैं।

EIn case of the destruction of a family its eternal sacred traditions are lost, and impiety afflicts the whole family with the loss of its values.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥1-41॥

Hअधर्म फैल जाने पर, हे कृष्ण, कुल की स्त्रियाँ भी दूषित हो जाती हैं। और हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्ण धर्म नष्ट हो जाता है।

EWhen sin prevails, O Krishn, women of the family stray from virtue, and when they are unchaste, O descendant of the ‘Vrishnis, (Varshneya: Krishn), there is generated an unholy mixture of classes (varnsankar).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 42
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥1-42॥

Hकुल के कुलघाती वर्णसंकर (वर्ण धर्म के न पालन से) नरक में गिरते हैं। इन के पितृ जन भी पिण्ड और जल की परम्पराओं के नष्ट हो जाने से (श्राद्ध आदि का पालन न करने से) अधोगति को प्राप्त होते हैं (उनका उद्धार नहीं होता)।

EThe unholy intermingling of classes condemns the destroyer of the family as well as the family itself to hell, for their ancestors, deprived of the offerings of obsequial cakes of rice and water libations, fall (from their heavenly abode).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥1-43॥

Hइस प्रकार वर्ण भ्रष्ट कुलघातियों के दोषों से उन के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं।

EThe sin committed by destroyers of families, which causes an intermingling of classes, puts to an end the timeless dharm of both caste and family.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥1-44॥

Hहे जनार्दन, कुलधर्म भ्रष्ट हुये मनुष्यों को अनिश्चित समय तक नरक में वास करना पडता है, ऐसा हमने सुना है।

EWe have heard, O Janardan, that hell is indeed the miserable habitat, for an infinite time, of men, the traditions of whose families have been destroyed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥1-45॥

Hअहो ! हम इस महापाप को करने के लिये आतुर हो यहाँ खडे हैं। राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने के लिये व्याकुल हैं।

ETempted by the pleasures of temporal power, alas, what a heinous crime have we resolved to commit by killing our own kith and kin!
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥1-46॥

Hयदि मेरे विरोध रहित रहते हुये, शस्त्र उठाये बिना भी यह धृतराष्ट्र के पुत्र हाथों में शस्त्र पकडे मुझे इस युद्ध भूमि में मार डालें, तो वह मेरे लिये (युद्ध करने की जगह) ज्यादा अच्छा होगा।

EI shall indeed prefer the prospect of being slain by the armed sons of Dhritrashtr while (I am myself) unarmed and unresisting.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 47

संजय बोले (Sanjay Said):

एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥1-47॥

Hयह कह कर शोक से उद्विग्न हुये मन से अर्जुन अपने धनुष बाण छोड कर रथ के पिछले भाग में बैठ गये।

ESpeaking thus and smitten by grief, in the midst of the battlefield, Arjun put aside his bow and arrows, and sat down in the chariot.

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