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सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 1 शलोक 1 से 47

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 1 शलोक 1 से 47 (Sanskrit, English & Hindi in easy words and meaning)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 1
धृतराष्ट्र बोले (Dhritrashtr said):

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥1-1॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H हे संजय, धर्मक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुये मेरे और पाण्डव के पुत्रों ने क्या किया।

E Assembled at Kurukshetr, at Dharmkshetr, and eager for combat, O Sanjay, what did my and Pandu’s sons do?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 2

संजय बोले (Sanjay said):

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥1-2॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H हे राजन, पाण्डवों की सेना व्यवस्था देख कर दुर्योधन ने अपने आचार्य के पास जा कर उनसे कहा।

E At the time, after having seen the Pandav army standing in battle array, King Duryodhan approached his teacher Dronacharya and spoke thus.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥1-3॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H हे आचार्य, आप के तेजस्वी शिष्य द्रुपदपुत्र द्वारा व्यवस्थित की इस विशाल पाण्डू सेना को देखिये।

E Behold, O master, this massive army of Pandu’s sons marshalled in battle formation by your wise pupil, the son of Drupad (Dhristdyumn).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 4, 5, 6
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥1-4॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥1-5॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥1-6॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H इसमें भीम और अर्जुन के ही समान बहुत से महान शूरवीर योधा हैं जैसे युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज तथा नरश्रेष्ट शैब्य। विक्रान्त युधामन्यु, वीर्यवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु), और द्रोपदी के पुत्र – सभी महारथी हैं।

E Here in the army are many valiant archers, Yuyudhan, Virat and the great martial commander Drupad, who are a worthy match for the brave Arjun and Bheem, and Dhrishtketu, Chekitan, and… the mighty King of Kashi, as well as Purujeet and Kuntibhoj, and Shaibya, the unparalleled among men and … The valorous Yudhmanyu, the mighty Uttmauj, Saubhadr, and Draupadi’s five sons, all great warriors.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥1-7॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H हे द्विजोत्तम, हमारी ओर भी जो विशिष्ट योद्धा हैं उन्हें आप को बताता हूँ। हमारी सैन्य के जो प्रमुख नायक हैं उन के नाम मैं आप को बताता हूँ।

E Be it known to you, O the worthiest of the twice-born (Brahmins), the names of those who are most eminent amongst us, the chiefs of our army; these I now name for your information.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥1-8॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H आप स्वयं, भीष्म पितामह, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण तथा सौमदत्त (सोमदत्त के पुत्र) – यह सभी प्रमुख योधा हैं।

E Your venerable self, Bheeshm and Karn, and also Kripavictor in wars, Ashwatthama and Vikarn, as well as Saumdutti (Bhurishrawa, son of Somdutt).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥1-9॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H हमारे पक्ष में युद्ध में कुशल, तरह तरह के शस्त्रों में माहिर और भी अनेकों योद्धा हैं जो मेरे लिये अपना जीवन तक त्यागने को त्यार हैं।

E And (there are) many other skilled warriors, too, equipped with numerous arms, who have forsaken hope of life for my sake.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥1-10॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी सेना का बल पर्याप्त नहीं है, परन्तु भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना बल पूर्ण है।

E Our army defended10 by Bheeshm is unconquerable, while their army defended by Bheem is easy to vanquish.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥1-11॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H इसलिये सब लोग जिन जिन स्थानों पर नियुक्त हों वहां से सभी हर ओर से भीष्म पितामह की रक्षा करें।

E So, while keeping to your respective stations in the several divisions, all of you should doubtlessly protect Bheeshm alone on all sides.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 12
तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥1-12॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H तब कुरुवृद्ध प्रतापवान भीष्म पितामह ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुये उच्च स्वर में सिंहनाद किया और शंख बजाना आरम्भ किया।

E To Duryodhan’s delight then, his mighty grandsire and the eldest of the Kaurav (Bheeshm) blew his conch to blare forth a lion-like roar.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥1-13॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H तब अनेक शंख, नगारे, ढोल, शृंगी आदि बजने लगे जिनसे घोर नाद उत्पन्न हुआ।

E Then there abruptly arose a tumult of conches and kettledrums, tabors, drums, and cow-horns.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥1-14॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H तब श्वेत अश्वों से वहित भव्य रथ में विराजमान भगवान माधव और पाण्डव पुत्र अर्जुन नें भी अपने अपने शंख बजाये।

E Then, too, Madhav (Krishn) and Pandu’s son (Arjun), seated in the magnificent chariot to which white steeds were yoked, blew their celestial conches.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥1-15॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H भगवान हृषिकेश नें पाञ्चजन्य नामक अपना शंख बजाया और धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त नामक शंख बजाया। तथा भीम कर्मा भीम नें अपना पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

E While Hrishikesh (Krishn) blew his conch Panchjanya and Dhananjay (Arjun) the conch named Devdutt, Vrikodar (Bheem) of awesome deeds blew the great conch Paundr.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥1-16॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर नें अपना अनन्त विजय नामक शंख, नकुल नें सुघोष और सहदेव नें अपना मणिपुष्पक नामक शंख बजाये।

E King Yudhisthir, the son of Kunti, blew the conch Anantvijay, whereas Nakul and Sahdev blew their conches Sughosh and Manipushpak.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 17, 18
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥1-17॥

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्॥1-18॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H धनुधर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट तथा अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रोपदी के पुत्र तथा अन्य सभी राजाओं नें तथा महाबाहु सौभद्र (अभिमन्यु) नें – सभी नें अपने अपने शंख बजाये।

E The King of Kashi, a great bowman, Shikhandi who dwells in the Supreme Spirit, the unvanquished Dhristdyumn, Virat and Satyaki, Drupad and the sons of Draupadi, and Subhadra’s son of powerful arms (Abhimanyu), all blew, O lord of the earth, their own conches.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥1-19॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H शंखों की उस महाध्वनि से आकाश और पृथिवि गूँजने लगीं तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय भिन्न गये।

E The loud tumult, reverberating through heaven and earth, pierced the hearts of Dhritrashtr’s sons.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 20, 21

संजय बोले (Sanjay said):

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥1-20॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

H तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यवस्थित देख, कपिध्वज (जिनके ध्वज पर हनुमान जी विराजमान थे) श्री अर्जुन नें शस्त्र उठाकर भगवान हृषिकेश से यह वाक्य कहे।

E Then, O King, after viewing the sons of Dhritrashtr in array, when the discharge of missiles was about to commence, Kunti’s son (Arjun), whose ensign bore the image of Hanuman, raised his bow and spoke to Hrishikesh thus:
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 21, 22

अर्जुन बोले (Arjun Said):

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥1-21॥
यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्‌धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥1-22॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

Hहे अच्युत, मेरा रथ दोनो सेनाओं के मध्य में स्थापित कर दीजिये ताकी मैं युद्ध की इच्छा रखने वाले इन योद्धाओं का निरीक्षण कर सकूं जिन के साथ मुझे युद्ध करना है।

E‘O Achyut (Krishn), keep my chariot between the two armies so that I may watch those who are formed up for combat and know whom I have to fight in the ensuing battle.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1-23॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

Hदुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय चाहने वाले राजाओं को जो यहाँ युद्ध के लिये एकत्रित हुये हैं मैं देखूँ लूं।

ESince I wish to observe those who have assembled here to fight for pleasing Dhritrashtr’s wicked-minded son (Duryodhan) in the battle.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 24

संजय बोले (Sanjay said):

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥1-24॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

Hहे भारत (धृतराष्ट्र), गुडाकेश के इन वचनों पर भगवान हृषिकेश नें उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में स्थापित कर दिया।

EThus addressed by Gudakesh, O descendant of Bharat (Dhritrashtr), Hrishikesh parked the unique chariot between the two armies,
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 25
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥1-25॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

Hरथ को भीष्म पितामह, द्रोण तथा अन्य सभी प्रमुख राजाओं के सामने (उन दोनो सेनाओं के बीच में) स्थापित कर, कृष्ण भगवान नें अर्जुन से कहा की हे पार्थ इन कुरुवंशी राजाओं को देखो।

Ein front of Bheeshm, Dron, and all the other kings, and said, ‘Behold, O son of Pritha (Arjun), the assembled Kuru.’
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 26, 27
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥1-26॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्॥1-27॥

हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद 

Hवहां पार्थ नें उस सेना में अपने पिता के भाईयों, पितामहों (दादा), आचार्यों, मामों, भाईयों, पुत्रों, मित्रों, पौत्रों, श्वशुरों (ससुर), संबन्धीयों को दोनो तरफ की सेनोओं में देखा।

EParth then saw, mustered in the two armies, uncles, granduncles, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons and friends, as well as fathers-in-law and wellwishers.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 28

संजय बोले (Sanjay Said):

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

Hइस प्रखार अपने सगे संबन्धियों और मित्रों को युद्ध में उपस्थित देख अर्जुन का मन करुणा पूर्ण हो उठा और उसने विषाद पूर्वक कृष्ण भगवान से यह कहा।

 

ESeeing all these kinsmen assembled together and overwhelmed by intense pity, he spoke thus in great sorrow:
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 28, 29, 30

अर्जुन बोले (Arjun Said):

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥1-28॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥1-29॥

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥1-30॥

Hहे कृष्ण, मैं अपने लोगों को युद्ध के लिये तत्पर यहाँ खडा देख रहा हूँ। इन्हें देख कर मेरे अंग ठण्डे पड रहे है, और मेरा मुख सूख रहा है, और मेरा शरीर काँपने लगा है। मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिरने को है, और मेरी सारी त्वचा मानो आग में जल उठी है। मैं अवस्थित रहने में अशक्त हो गया हूँ, मेरा मन भ्रमित हो रहा है।

 

ESeeing these kith and kin, mustered with the purpose of waging war, O Krishn, my limbs grow weak, my mouth is dry, my body trembles, my hair stands on end, the Gandeev (Arjun’s bow) slips from my hand, my skin is burning all over, I am unable to stand, and my mind is bewildered.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 31

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥1-31॥

Hहे केशव, जो निमित्त है उसे में भी मुझे विपरीत ही दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि हे केशव, मुझे अपने ही स्वजनों को मारने में किसी भी प्रकार का कल्याण दिखाई नहीं देता।

 

EI see, O Madhav (Krishn), inauspicious portents, and I can perceive no prefix in the idea of slaughtering kinsmen in the battle.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 32

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥1-32॥

Hहे कृष्ण, मुझे विजय, या राज्य और सुखों की इच्छा नहीं है। हे गोविंद, (अपने प्रिय जनों की हत्या कर) हमें राज्य से, या भोगों से, यहाँ तक की जीवन से भी क्या लाभ है।

 

EI aspire, O Krishn, after neither victory nor a realm and its pleasures for of what avail is sovereignty to us, O Govind (Krishn), or enjoyment, or even life itself?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 33

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥1-33॥

Hजिन के लिये ही हम राज्य, भोग तथा सुख और धन की कामना करें, वे ही इस युद्ध में अपने प्राणों की बलि चढने को त्यार यहाँ अवस्थित हैं।

 

EThey for whose sake we crave for a kingdom, pleasures, and enjoyments are formed up here, putting at stake both their lives and wealth.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 34, 35

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा॥1-34॥

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥1-35॥

Hगुरुजन, पिता जन, पुत्र, तथा पितामहा, मातुल, ससुर, पौत्र, साले आदि सभी संबन्धि यहाँ प्रस्तुत हैं। हे मधुसूदन। इन्हें हम त्रैलोक्य के राज के लिये भी नहीं मारना चाहेंगें, फिर इस धरती के लिये तो बात ही क्या है, चाहे ये हमें मार भी दें।

 

ETeachers, uncles, nephews as well as granduncles, maternal uncles, fathers-in-law, grandnephews, brothersin-law, and other kinsmen. Though they might slay me, I yet have no desire to kill them, O Madhusudan22 (Krishn), even for a realm made up of the three worlds, still less for this earth alone.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 36

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥1-36॥

Hधृतराष्ट्र के इन पुत्रों को मार कर हमें भला क्या प्रसन्नता प्राप्त होगी हे जनार्दन। इन आततायिनों को मार कर हमें पाप ही प्राप्त होगा।

 

EWhat happiness can we have, O Janardan(Krishn), from slaying these sons of Dhritrashtr? Only sin will fall to our lot if we kill even these wicked men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 37

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥1-37॥

Hइसलिये धृतराष्ट्र के पुत्रो तथा अपने अन्य संबन्धियों को मारना हमारे लिये उचित नहीं है। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मार कर हमें किस प्रकार सुख प्राप्त हो सकता है।

 

ESo it is not for us to kill Dhritrashtr’s sons, for how indeed can we be happy, O Madhav (Krishn), if we slaughter our own kinsmen?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 38, 39

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥1-38॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥1-39॥

Hयद्यपि ये लोग, लोभ के कारण जिनकी बुद्धि हरी जा चुकी है, अपने कुल के ही क्षय में और अपने मित्रों के साथ द्रोह करने में कोई दोष नहीं देख पा रहे। परन्तु हे जनार्दन, हम लोग तो कुल का क्षय करने में दोष देख सकते हैं, हमें इस पाप से निवृत्त क्यों नहीं होना चाहिये (अर्थात इस पाप करने से टलना चाहिये)।

 

EAlthough, with their minds vitiated by greed, they (the Kaurav) have no awareness of the evil they do in destroying families and in being treacherous to friends, why should we, O Janardan, who know that it is evil to destroy families, not turn away from the sinful act
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥1-40॥

Hकुल के क्षय हो जाने पर कुल के सनातन (सदियों से चल रहे) कुलधर्म भी नष्ट हो जाते हैं। और कुल के धर्म नष्ट हो जाने पर सभी प्रकार के अधर्म बढने लगते हैं।

 

EIn case of the destruction of a family its eternal sacred traditions are lost, and impiety afflicts the whole family with the loss of its values.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥1-41॥

Hअधर्म फैल जाने पर, हे कृष्ण, कुल की स्त्रियाँ भी दूषित हो जाती हैं। और हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्ण धर्म नष्ट हो जाता है।

 

EWhen sin prevails, O Krishn, women of the family stray from virtue, and when they are unchaste, O descendant of the ‘Vrishnis, (Varshneya: Krishn), there is generated an unholy mixture of classes (varnsankar).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 42

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥1-42॥

Hकुल के कुलघाती वर्णसंकर (वर्ण धर्म के न पालन से) नरक में गिरते हैं। इन के पितृ जन भी पिण्ड और जल की परम्पराओं के नष्ट हो जाने से (श्राद्ध आदि का पालन न करने से) अधोगति को प्राप्त होते हैं (उनका उद्धार नहीं होता)।

 

EThe unholy intermingling of classes condemns the destroyer of the family as well as the family itself to hell, for their ancestors, deprived of the offerings of obsequial cakes of rice and water libations, fall (from their heavenly abode).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 43

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥1-43॥

Hइस प्रकार वर्ण भ्रष्ट कुलघातियों के दोषों से उन के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं।

 

EThe sin committed by destroyers of families, which causes an intermingling of classes, puts to an end the timeless dharm of both caste and family.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 44

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥1-44॥

Hहे जनार्दन, कुलधर्म भ्रष्ट हुये मनुष्यों को अनिश्चित समय तक नरक में वास करना पडता है, ऐसा हमने सुना है।

 

EWe have heard, O Janardan, that hell is indeed the miserable habitat, for an infinite time, of men, the traditions of whose families have been destroyed.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥1-45॥

Hअहो ! हम इस महापाप को करने के लिये आतुर हो यहाँ खडे हैं। राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने के लिये व्याकुल हैं।

 

ETempted by the pleasures of temporal power, alas, what a heinous crime have we resolved to commit by killing our own kith and kin!
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 46

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥1-46॥

Hयदि मेरे विरोध रहित रहते हुये, शस्त्र उठाये बिना भी यह धृतराष्ट्र के पुत्र हाथों में शस्त्र पकडे मुझे इस युद्ध भूमि में मार डालें, तो वह मेरे लिये (युद्ध करने की जगह) ज्यादा अच्छा होगा।

 

EI shall indeed prefer the prospect of being slain by the armed sons of Dhritrashtr while (I am myself) unarmed and unresisting.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 1 शलोक 47

संजय बोले (Sanjay Said):

एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥1-47॥

Hयह कह कर शोक से उद्विग्न हुये मन से अर्जुन अपने धनुष बाण छोड कर रथ के पिछले भाग में बैठ गये।

 

ESpeaking thus and smitten by grief, in the midst of the battlefield, Arjun put aside his bow and arrows, and sat down in the chariot.
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