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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता06. आत्मसंयमयोगध्यानयोग वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 6 शलोक 11 से 32)

ध्यानयोग वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 6 शलोक 11 से 32)

ध्यानयोग वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 6 शलोक 11 से 32)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 11

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥6- 11॥

H उसे ऍसे आसन पर बैठना चाहिये जो साफ और पवित्र स्थान पर स्थित हो, स्थिर हो, और जो न ज़्यादा ऊँचा हो और न ज़्यादा नीचा हो, और कपड़े, खाल या कुश नामक घास से बना हो। E At a clean spot he should devise a seat of kush-grass or deer-skin covered with a piece of cloth, which is neither too high nor too low.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 12
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥6- 12॥ H वहाँ अपने मन को एकाग्र कर, चित्त और इन्द्रीयों को अक्रिय कर, उसे आत्म शुद्धि के लिये ध्यान योग का अभ्यास करना चाहिये। E He should then sit on it and practise yog, concentrating his mind and restraining the senses, for self-purification.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 13
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥6- 13॥ H अपनी काया, सिर और गर्दन को एक सा सीधा धारण कर, अचल रखते हुऐ, स्थिर रह कर, अपनी नाक के आगे वाले भाग की ओर एकाग्रता से देखते हुये, और किसी दिशा में नहीं देखना चाहिये। E Holding his body, head, and neck firmly erect, his eyes should concentrate on the tip of the nose, looking neither right nor left.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥6- 14॥ H प्रसन्न आत्मा, भय मुक्त, ब्रह्मचार्य के व्रत में स्थित, मन को संयमित कर, मुझ मे चित्त लगाये हुऐ, इस प्रकार युक्त हो मेरी ही परम चाह रखते हुऐ। E Abiding in continence, fearless, serene at heart, alert and restrained in mind, he should surrender himself firmly to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥6- 15॥ H इस प्रकार योगी सदा अपने आप को नियमित करता हुआ, नियमित मन वाला, मुझ मे स्थित होने ने कारण परम शान्ति और निर्वाण प्राप्त करता है। E The yogi with a restrained mind who thus meditates on me incessantly at last attains to the sublime peace that dwells in me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥6- 16॥ H हे अर्जुन, न बहुत खाने वाला योग प्राप्त करता है, न वह जो बहुत ही कम खाता है। न वह जो बहुत सोता है और न वह जो जागता ही रहता है। E This yog, O Arjun, is neither achieved by one who eats too much or too little, nor by one who sleeps too much or too little.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥6- 17॥ H जो नियमित आहार लेता है और नियमित निर-आहार रहता है, नियमित ही कर्म करता है, नियमित ही सोता और जागता है, उसके लिये यह योगा दुखों का अन्त कर देने वाली हो जाती है। E Yog, the destroyer of all grief, is achieved only by those who regulate their food and recreation, who strive according to their capacity, and who sleep in moderation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥6- 18॥ H जब सवंयम ही उसका चित्त, बिना हलचल के और सभी कामनाओं से मुक्त, उसकी आत्मा मे विराजमान रहता है, तब उसे युक्त कहा जाता है। E A man is said to be endowed with yog when, restrained by the practice of selfless action and contented with Self, his mind is freed from all desires.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥6- 19॥ H जैसे एक दीपक वायु न होने पर हिलता नहीं है, उसी प्रकार योग द्वारा नियमित किया हुआ योगी का चित्त होता है। E An analogy is (usually) drawn between the lamp whose flame does not flicker because there is no wind and the fully restrained mind of a yogi engaged in contemplation of God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥6- 20॥ H जब उस योगी का चित्त योग द्वारा विषयों से हट जाता है तब वह सवयं अपनी आत्मा को सवयं अपनी आत्मा द्वारा देख तुष्ठ होता है। E In the state in which even the yog-restrained mind is dissolved by a direct perception of God, he (the worshipper) rests contented in his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥6- 21॥ H वह अत्यन्त सुख जो इन्द्रियों से पार उसकी बुद्धि मे समाता है, उसे देख लेने के बाद योगी उसी मे स्थित रहता है और सार से हिलता नहीं। E After knowing God, he (the yogi ) dwells for ever and unwavering in the state in which he is blessed with the eternal, sense-transcending joy that can be felt only by a refined and subtle intellect; and…
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥6- 22॥ H तब बड़े से बड़ा लाभ प्राप्त कर लेने पर भी वह उसे अधिक नहीं मानता, और न ही, उस सुख में स्थित, वह भयानक से भयानक दुख से भी विचलित होता है। E In this state, in which he believes that there can be no greater good than the ultimate peace he has found in God, he is unshaken by even the direst of all griefs.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 23
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥6- 23॥ H दुख से जो जोड़ है उसके इस टुट जाने को ही योग का नाम दिया जाता है। निश्चय कर और पूरे मन से इस योग मे जुटना चाहिये। E It is a duty to practise this yog, untouched by miseries of the world, with vigour and determination, and without a sense of ennui.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 24
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥6- 24॥ H शुरू होने वालीं सभी कामनाओं को त्याग देने का संकल्प कर, मन से सभी इन्द्रियों को हर ओर से रोक कर। E Abandoning all desire, lust, and attachment, and pulling in by an exercise of the mind the numerous senses from all sides,
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 25
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥6- 25॥ H धीरे धीरे बुद्धि की स्थिरता ग्ररण करते हुऐ मन को आत्म मे स्थित कर, कुछ भी नहीं सोचना चाहिये। E His intellect should also rein in the mind firmly and make it contemplate nothing except God and, thus step by step, he should proceed towards the attainment of final liberation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥6- 26॥ H जब जब चंचल और अस्थिर मन किसी भी ओर जाये, तब तब उसे नियमित कर अपने वश में कर लेना चाहिये। E Doing away with the causes that make the inconstant and fickle wander among worldly objects, he should devote his mind to God alone.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥6- 27॥ H ऍसे प्रसन्न चित्त योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है जिसका रजो गुण शान्त हो चुका है, जो पाप मुक्त है और ब्रह्म मे समा चुका है। E The most sublime happiness is the lot of the yogi whose mind is at peace, who is free from evil, whose passion and moral blindness have been dispelled, and who has become one with God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 28
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥6- 28॥ H अपनी आत्मा को सदा योग मे लगाये, पाप मुक्त हुआ योगी, आसानी से ब्रह्म से स्पर्श होने का अत्यन्त सुख भोगता है। E Thus constantly dedicating his Self to God, the immaculate yogi experiences the eternal bliss of realization..
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥6- 29॥ H योग से युक्त आत्मा, अपनी आत्मा को सभी जीवों में देखते हुऐ और सभी जीवों मे अपनी आत्मा को देखते हुऐ हर जगह एक सा रहता है। E The worshipper, whose Self has achieved the state of yog and who sees all with an equal eye, beholds his own Self in all beings and all beings in his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥6- 30॥ H जो मुझे हर जगह देखता है और हर चीज़ को मुझ में देखता है, उसके लिये मैं कभी ओझल नहीं होता और न ही वो मेरे लिये ओझल होता है। E From the man, who sees me as the Soul in all beings and all beings in me (Vasudev), I am not hidden and he is not hidden from me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥6- 31॥ H सभी भूतों में स्थित मुझे जो अन्नय भाव से स्थित हो कर भजता है, वह सब कुछ करते हुऐ भी मुझ ही में रहता है। E The even-minded yogi (who has known the unity of the individual Soul and the Supreme Spirit ) who adores me (Vasudev), the Soul in all beings, abides in me no matter whatever he does.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 6 शलोक 32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥6- 32॥ H हे अर्जुन, जो सदा दूसरों के दुख सुख और अपने दुख सुख को एक सा देखता है, वही योगी सबसे परम है। E The worshipper, O Arjun, who perceives all things as identical and regards happiness and sorrow as identical, is thought to be the most accomplished yogi.

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