ज्ञान में निष्ठा (अध्याय 18 शलोक 49 से 55)

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ज्ञान में निष्ठा (अध्याय 18 शलोक 49 से 55)

 

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 शलोक 49 

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥१८- ४९॥
  • हर जगह असक्त (संग रहित) बुद्धि मनुष्य जिसने अपने आप पर जीत पा ली है, हलचल (स्पृह) मुक्त है, ऐसा मनुष्य सन्यास (मन से इच्छा कर्मों के त्याग) द्वारा नैष्कर्म सिद्धि को प्राप्त होता है।
  • He whose intellect is aloof all round, who is without desire, and who has conquered his mind, attains to the ultimate state that transcends all action through renunciation.

     

 शलोक 50 

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥१८- ५०॥
  • इस प्रकार सिद्धि प्राप्त किया मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त करता है, तथा उसके ज्ञान की क्या निष्ठा होती है वह तुम मुझ से संक्षेप में सुनो।
  • Learn in brief from me, O son of Kunti, of how one who is immaculate achieves realization of the Supreme Being, which represents the culmination of knowledge.

     

 शलोक 51, 52, 53 

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥१८- ५१॥

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥१८- ५२॥

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१८- ५३॥
  • पवित्र बुद्धि से युक्त, अपने आत्म को स्थिरता से नियमित कर, शब्द आदि विषयों को त्याग कर, तथा राग-द्वेष आदि को छोड कर, एकेले स्थान पर निवास करते हुये, नियमित आहार करते हुये, अपने शरीर, वाणी और मन को योग में प्रविष्ट करते हुये वह योगी नित्य ध्यान योग में लगा, वैराग्य पर आश्रित रहता है। तथा अहंकार, बल, घमन्ड, इच्छा, क्रोध और घर संपत्ति आदि को मन से त्याग कर, 'मैं' भाव से मुक्त हो शान्ति को प्राप्त करता है और ब्रह्म प्राप्ति का पात्र बनता है।
  • Blessed with a pure intellect, firmly in command of the Self, with objects of sensual gratification like sound forsaken , with both fondness and revulsion destroyed,- Dwelling in seclusion, eating frugally, subdued in mind, speech and body, incessantly given to the yog of meditation, firmly resigned,- Giving up conceit, arrogance of power, yearning, ill humour, and acquisitiveness, devoid of attachment, and in possession of a mind at repose, a man is worthy of becoming one with God.

     

 शलोक 54 

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८- ५४॥
  • ब्रह्म के साथ एक हो जाने पर, वह प्रसन्न आत्मा, न शोक करता है न इच्छा करता है। सभी जीवों के प्रति एक सा हो कर, वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है।
  • In this serene-tempered man, who views all beings equally, who abides intently in the Supreme Being, neither grieving over nor hankering after anything, there is fostered a faith in me that transcends all else.

     

 शलोक 55 

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥१८- ५५॥
  • उस भक्ति द्वारा वह मुझे पूर्णत्या, जितना मैं हुँ, सार तक मुझे जान लेता है। और मुझे सार तक जान लेने पर मुझ में ही प्रवेश कर जाता है (मुझ में एक हो जाता है)।
  • Through his transcendental faith he knows my essence well, what my reach is, and having thus known my essence he is at once united with me.

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