श्रीमद्भगवद्गीता (73)

श्री गीता महात्म्य (अध्याय 18 शलोक 67 से 78)

श्री गीता महात्म्य (अध्याय 18 शलोक 67 से 78)
(3 votes)

विश्वरूप का दर्शन (अध्याय 11 शलोक 14 से 31)

विश्वरूप का दर्शन (अध्याय 11 शलोक 14 से 31)
(2 votes)

भगवान की महिमा (अध्याय 9 शलोक 16 से 19)

भगवान की महिमा (अध्याय 9 शलोक 16 से 19)
(1 Vote)

संसार की उत्पत्ति (अध्याय 14 शलोक 1 से 4)

संसार की उत्पत्ति (अध्याय 14 शलोक 1 से 4)
(0 votes)

यज्ञादि कर्म अनिवार्य (अध्याय 3 शलोक 9 से 24)

यज्ञादि कर्म अनिवार्य (अध्याय 3 शलोक 9 से 24)
(1 Vote)

विश्वरूप का वर्णन (अध्याय 11 शलोक 9 से 13)

विश्वरूप का वर्णन (अध्याय 11 शलोक 9 से 13)
(1 Vote)

मनोसंयम विधि (अध्याय 6 शलोक 33 से 36)

मनोसंयम विधि (अध्याय 6 शलोक 33 से 36)
(0 votes)

सगुण ब्रह्म का ज्ञान (अध्याय 7 शलोक 1 से 12)

सगुण ब्रह्म का ज्ञान (अध्याय 7 शलोक 1 से 12)
(1 Vote)

निष्काम कर्म वर्णन (अध्याय 6 शलोक 1 से 4)

निष्काम कर्म वर्णन (अध्याय 6 शलोक 1 से 4)
(0 votes)

युद्ध कौशल वर्णन (अध्याय 1 शलोक 1 से 19)

युद्ध कौशल वर्णन (अध्याय 1 शलोक 1 से 19)
(0 votes)

निष्काम कर्मयोग (अध्याय 2 शलोक 39 से 53)

निष्काम कर्मयोग (अध्याय 2 शलोक 39 से 53)
(2 votes)

प्रज्ञ लक्षण महिमा (अध्याय 2 शलोक 54 से 72)

प्रज्ञ लक्षण महिमा (अध्याय 2 शलोक 54 से 72)
(0 votes)

भगवान का दर्शन देना (अध्याय 11 शलोक 47 से 50)

भगवान का दर्शन देना (अध्याय 11 शलोक 47 से 50)
(1 Vote)

विश्वरूप का कथन (अध्याय 11 शलोक 5 से 8)

विश्वरूप का कथन (अध्याय 11 शलोक 5 से 8)
(0 votes)

ज्ञानयोग का विस्तार (अध्याय 5 शलोक 13 से 26)

ज्ञानयोग का विस्तार (अध्याय 5 शलोक 13 से 26)
(0 votes)

कर्म की महिमा (अध्याय 5 शलोक 1 से 12)

कर्म की महिमा (अध्याय 5 शलोक 1 से 12)
(0 votes)

कर्तव्य व कर्म का महत्व (अध्याय 3 शलोक 1 से 8)

कर्तव्य व कर्म का महत्व (अध्याय 3 शलोक 1 से 8)
(1 Vote)

अर्जुन द्वारा याचना (अध्याय 11 शलोक 35 से 46)

अर्जुन द्वारा याचना (अध्याय 11 शलोक 35 से 46)
(0 votes)

भागवद् महिमा (अध्याय 4 शलोक 1 से 18)

भागवद् महिमा (अध्याय 4 शलोक 1 से 18)
(0 votes)

भक्तों के लक्षण (अध्याय 12 शलोक 13 से 20)

भक्तों के लक्षण (अध्याय 12 शलोक 13 से 20)
(1 Vote)

ज्ञानी व अज्ञानी के लक्षण (अध्याय 3 शलोक 25 से 36)

ज्ञानी व अज्ञानी के लक्षण (अध्याय 3 शलोक 25 से 36)
(0 votes)

संसार उत्पत्ति वर्णन (अध्याय 9 शलोक 7 से 10)

संसार उत्पत्ति वर्णन (अध्याय 9 शलोक 7 से 10)
(0 votes)

क्षत्रिय का धर्म युद्ध (अध्याय 2 शलोक 31 से 38)

क्षत्रिय का धर्म युद्ध (अध्याय 2 शलोक 31 से 38)
(0 votes)

वर्ण धर्म फल (अध्याय 18 शलोक 41 से 48)

वर्ण धर्म फल (अध्याय 18 शलोक 41 से 48)
(0 votes)

प्रकृति व पुरुष वर्णन (अध्याय 13 शलोक 19 से 34)

प्रकृति व पुरुष वर्णन (अध्याय 13 शलोक 19 से 34)
(0 votes)

गुण भेद वर्णन (अध्याय 18 शलोक 19 से 40)

गुण भेद वर्णन (अध्याय 18 शलोक 19 से 40)
(1 Vote)

गुण अनुसार भेद वर्णन (अध्याय 17 शलोक 7 से 22)

गुण अनुसार भेद वर्णन (अध्याय 17 शलोक 7 से 22)
(0 votes)

दैवी और आसुरी सम्पद् (अध्याय 16 शलोक 1 से 5)

दैवी और आसुरी सम्पद् (अध्याय 16 शलोक 1 से 5)
(0 votes)

पूजा के फल (अध्याय 9 शलोक 20 से 25)

पूजा के फल (अध्याय 9 शलोक 20 से 25)
(0 votes)

ॐ तत्सत् व्याख्या (अध्याय 17 शलोक 23 से 28)

ॐ तत्सत् व्याख्या (अध्याय 17 शलोक 23 से 28)
(1 Vote)

घोर तप वर्णन (अध्याय 17 शलोक 1 से 6)

घोर तप वर्णन (अध्याय 17 शलोक 1 से 6)
(0 votes)

परमेश्वर के रूप का वर्णन (अध्याय 15 शलोक 12 से 15)

परमेश्वर के रूप का वर्णन (अध्याय 15 शलोक 12 से 15)
(0 votes)

शुक्ल व पक्ष वर्णन (अध्याय 8 शलोक 23 से 28)

शुक्ल व पक्ष वर्णन (अध्याय 8 शलोक 23 से 28)
(2 votes)

अश्वत्थ वृक्ष की व्याख्या (अध्याय 15 शलोक 1 से 6)

अश्वत्थ वृक्ष की व्याख्या (अध्याय 15 शलोक 1 से 6)
(0 votes)

ज्ञानी की महिमा (अध्याय 4 शलोक 33 से 42)

ज्ञानी की महिमा (अध्याय 4 शलोक 33 से 42)
(0 votes)

देवताओं की पूजा (अध्याय 7 शलोक 20 से 23)

देवताओं की पूजा (अध्याय 7 शलोक 20 से 23)
(0 votes)

आलोचना व प्रशंसा (अध्याय 7 शलोक 24 से 30)

आलोचना व प्रशंसा (अध्याय 7 शलोक 24 से 30)
(0 votes)

भागवत् महिमा का वर्णन (अध्याय 10 शलोक 12 से 18)

भागवत् महिमा का वर्णन (अध्याय 10 शलोक 12 से 18)
(1 Vote)

तीन गुणों का विस्तार (अध्याय 14 शलोक 5 से 8)

तीन गुणों का विस्तार (अध्याय 14 शलोक 5 से 8)
(0 votes)

भक्तियोग वर्णन (अध्याय 8 शलोक 8 से 22)

भक्तियोग वर्णन (अध्याय 8 शलोक 8 से 22)
(0 votes)

भगवत्प्राप्ति की विधि (अध्याय 14 शलोक 9 से 27)

भगवत्प्राप्ति की विधि (अध्याय 14 शलोक 9 से 27)
(0 votes)

उदासीन भक्ति (अध्याय 9 शलोक 26 से 34)

उदासीन भक्ति (अध्याय 9 शलोक 26 से 34)
(0 votes)

यज्ञ विवरण (अध्याय 4 शलोक 24 से 32)

यज्ञ विवरण (अध्याय 4 शलोक 24 से 32)
(0 votes)

विभूति व योगशक्ति (अध्याय 10 शलोक 1 से 7)

विभूति व योगशक्ति (अध्याय 10 शलोक 1 से 7)
(0 votes)

विषयक प्रश्नोत्तर (अध्याय 8 शलोक 1 से 7)

विषयक प्रश्नोत्तर (अध्याय 8 शलोक 1 से 7)
(1 Vote)

ज्ञानयोग का वर्णन (अध्याय 2 शलोक 11 से 30)

ज्ञानयोग का वर्णन (अध्याय 2 शलोक 11 से 30)
(0 votes)

आसुरी सम्पदा के चिहन् (अध्याय 16 शलोक 6 से 20)

आसुरी सम्पदा के चिहन् (अध्याय 16 शलोक 6 से 20)
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ज्ञान में निष्ठा (अध्याय 18 शलोक 49 से 55)

ज्ञान में निष्ठा (अध्याय 18 शलोक 49 से 55)
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अर्जुन की प्रार्थना (अध्याय 11 शलोक 1 से 4)

अर्जुन की प्रार्थना (अध्याय 11 शलोक 1 से 4)
(1 Vote)

योद्धाओं का अवलोकन (अध्याय 1 शलोक 20 से 27)

योद्धाओं का अवलोकन (अध्याय 1 शलोक 20 से 27)
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नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

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इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
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