16. मौसलपर्व (9)

Chapter 5

1 [वै] ततॊ ययुर दारुकः केशवश च; बभ्रुश च रामस्य पदं पतन्तः अथापश्यन रामम अनन्तवीर्यं; वृक्षे सथितं चिन्तयानं विविक्ते 2 ततः समासाद्य महानुभावः; कृष्णस तदा दारुकम अन्वशासत गत्वा कुरूञ शीघ्रम इमं महान्तं; पार्थाय शंसस्व वधं यदूनाम 3 ततॊ ऽरजुनः कषिप्रम इहॊपयातु; शरुत्वा मृतान यादवान बरह्मशापात इत्य एवम उक्तः सा ययौ…

Chapter 6

1 [वै] दारुकॊ ऽपि कुरून गत्वा दृष्ट्वा पार्थान महारथान आचष्ट मौसाले वृष्णीन अन्यॊन्येनॊपसंहृतान 2 शरुत्वा विनष्टान वार्ष्णेयान सभॊजकुकुरान्धकान पाण्डवाः शॊकसंतप्ता वित्रस्तमनसॊ ऽभवन 3 ततॊ ऽरजुनस तान आमन्त्र्य केशवस्य परियः सखा परययौ मातुलं दरष्टुं नेदम अस्तीति चाब्रवीत 4 सा वृष्णिनिलयं गत्वा दारुकेण सह परभॊ ददर्श दवारकां वीरॊ मृतनाथाम इव सत्रियम 5…

Chapter 3

1 [वै] एवं परयतमानानां वृष्णीनाम अन्धकैः सह कालॊ गृहाणि सार्वेणां परिचक्राम नित्यशः 2 करालॊ विकटॊ मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः गृहाण्य अवेक्ष्य वृष्णीनां नादृश्यत पुनः कव चित 3 उत्पेदिरे महावाता दारुणाश चा दिने दिने वृष्ण्यन्धकविनाशाय बहवॊ रॊमहर्षणाः 4 विवृद्धमूषका रथ्या विभिन्नमणिकास तथा चीची कूचीति वाश्यन्त्यः सारिका वृष्णिवेश्मसु नॊपशाम्यति शब्दश च स दिवारात्रम…

Chapter 4

1 [वै] काली सत्री पाण्डुरैर दन्तैः परविश्य हसती निशि सत्रियः सवप्नेषु मुष्णन्ती दवारकां परिधावति 2 अलंकाराश च छत्त्रं च धवजाश च कवचानि च हरियमाणान्य अदृश्यन्त रक्षॊभिः सुभयानकैः 3 तच चाग्ग्नि दत्तं कृष्णस्य वज्रनाभम अयॊ मयम दिवम आचक्रमे चक्रं वृष्णीनां पश्यतां तदा 4 युक्तं रथं दिव्यम आदित्यवर्णं; हयाहरन पश्यतॊ दारुकस्य ते…

Chapter 2

1 [ज] कथं विनष्टा भगवन्न अन्धका वृष्णिभिः सह पश्यतॊ वासुदेवस्य भॊजाश चैव महारथाः 2 [वै] षट तरिंशे ऽथ ततॊ वर्षे वृष्णीनाम अनयॊ महान अन्यॊन्यं मुसलैस ते तु निजघ्नुः कालचॊदिताः 3 [ज] केनानुशप्तास ते वीराः कषयं वृष्ण्यन्धका ययुः भॊजाश च दविजवर्यत्वं विस्तरेण वदस्व मे 4 [वै] विश्वामित्रं च कण्वं च नारदं…

Chapter 7

1 [वै] तं शयानं महात्मानं वीरम आनक दुन्दुभिम पुत्रशॊकाभिसंतप्तं ददर्श कुरुपुंगवः 2 तस्याश्रु परिपूर्णाक्षॊ वयूढॊरस्कॊ महाभुजः आर्तस्यार्ततरः पार्थः पादौ जग्राह भारत 3 समालिङ्ग्यार्जुनं वृद्धः स भुजाभ्यां महाभुजः रुदन पुत्रान समरन सार्वान विललाप सुविह्वलः भरातॄन पुत्रांश च पौत्रांश च दौहित्रांश च सखीन अपि 4 [वासु] यैर जिता भूमिपालाश च दैत्याश च…

Chapter 9

1 [वै] परविशन्न अर्जुनॊ राजन्न आश्रमं सत्यवादिनः ददर्शासीनम एकान्ते मुनिं सत्यवती सुतम 2 स तम आसाद्य धर्मज्ञम उपतस्थे महाव्रतम अर्जुनॊ ऽसमीति नामास्मै निवेद्याभ्यवदत ततः 3 सवागतं ते ऽसत्व इति पराह मुनिः सत्यवतीसुतः आस्यताम इति चॊवाच परसन्नात्मा महामुनिः 4 तम अप्रतीत मनसं निःश्वसन्तं पुनः पुनः निर्विण्ण मनसं दृष्ट्वा पार्थं वयासॊ ऽबरवीद…

Chapter 8

1 [वै] एवम उक्तः स बीभत्सुर मातुलेन परंतपः दुर्मना दीनमनसं वसुदेवम उवाच ह 2 नाहं वृष्णिप्रवीरेण मधुभिश चैव मातुल विहीनां पृथिवीं दरष्टुं शक्तश चिरम इह परभॊ 3 राजा च भीमसेनश च सहदेवश च पाण्डवः नकुलॊ याज्ञसेनी च षड एकमनसॊ वयम 4 राज्ञः संक्रमणे चापि कालॊ ऽयं वर्तते धरुवम तम इमं…

Chapter 1

1 [वै] षट तरिंशे तव अथ संप्राप्ते वर्षे कौरवनन्दन ददर्श विपरीतानि निमित्तानि युधिष्ठिरः 2 ववुर वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्कर वर्षिणः अपसव्यानि शकुना मण्डलानि परचक्रिरे 3 परत्यगूहुर महानद्यॊ दिशॊ नीहारसंवृताः उल्काश चाङ्गार वर्षिण्यः परपेतुर गगनाद भुवि 4 आदित्यॊ रजसा राजन समवच्छन्न मण्डलः विरश्मिर उदये नित्यं कबन्धैः समदृश्यत 5 परिवेषाश च दृश्यन्ते…
 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

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