14. आश्वमेधिकपर्व (40)

Chapter 33

1 [बर] नाहं तथा भीरु चरामि लॊके; तथा तवं मां तर्कयसे सवबुद्ध्या विप्रॊ ऽसमि मुक्तॊ ऽसमि वनेचरॊ ऽसमि; गृहस्थ धर्मा बरह्म चारी तथास्मि 2 नाहम…
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Chapter 38

1 [बर] अतः परं परवक्ष्यामि तृतीयं गुणम उत्तमम सर्वभूतहितं लॊके सतां धर्मम अनिन्दितम 2 आनन्दः परीतिर उद्रेकः पराकाश्यं सुखम एव च अकार्पण्यम असंरम्भः संतॊषः शरद्दधानता…
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Chapter 18

1 [बर] शुभानाम अशुभानां च नेह नाशॊ ऽसति कर्मणाम पराप्य पराप्य तु पच्यन्ते कषेत्रं कषेत्रं तथा तथा 2 यथा परसूयमानस तु फली दद्यात फलं बहु…
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Chapter 37

1 [बर] रजॊ ऽहं वः परवक्ष्यामि याथा तथ्येन सत्तमाः निबॊधत महाभागा गुणवृत्तं च सर्वशः 2 संघातॊ रूपम आयासः सुखदुःखे हिमातपौ ऐश्वर्यं विग्रहः संधिर हेतुवादॊ ऽरतिः…
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Chapter 17

1 [वा] ततस तस्यॊपसंगृह्य पादौ परश्नान सुदुर्वचान पप्रच्छ तांश च सर्वान स पराह धर्मभृतां वरः 2 [काष्यप] कथं शरीरं चयवते कथं चैवॊपपद्यते कथं कष्टाच च…
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Chapter 14

1 [व] एवं बहुविधैर वाक्यैर मुनिभिस तैस तपॊधनैः समाश्वस्यत राजर्षिर हतबन्धुर युधिष्ठिरः 2 सॊ ऽनुनीतॊ भगवता विष्टर शरवसा सवयम दवैपायनेन कृष्णेन देवस्थानेन चाभिभूः 3 नारदेनाथ…
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Chapter 10

1 [इ] एवम एतद बरह्मबलं गरीयॊ; न बरह्मतः किं चिद अन्यद गरीयः आविक्षितस्य तु बलं न मृष्ये; वज्रम अस्मै परहरिष्यामि घॊरम 2 धृतराष्ट्र परहितॊ गच्छ…
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Chapter 2

1 [व] एवम उक्तस तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता तूष्णीं बभूव मेधावी तम उवाचाथ केशवः 2 अतीव मनसा शॊकः करियमाणॊ जनाधिप संतापयति वैतस्य पूर्वप्रेतान पितामहान…
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Chapter 21

1 [बर] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम निबॊध दश हॊतॄणां विधानम इह यादृशम 2 सर्वम एवात्र विज्ञेयं चित्तं जञानम अवेक्षते रेतः शरीरभृत काये विज्ञाता तु शरीरभृत…
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Chapter 8

1 [स] गिरेर हिमवतः पृष्ठे पुञ्जवान नाम पर्वतः तप्यते यत्र भगवांस तपॊनित्यम उमापतिः 2 वनस्पतीनां मूलेषु टङ्केषु शिखरेषु च गुहासु शैलराजस्य यथाकामं यथासुखम 3 उमा…
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Chapter 32

1 [बर] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम बराह्मणस्य च संवादं जनकस्य च भामिनि 2 बराह्मणं जनकॊ राजा सन्नं कस्मिंश चिद आगमे विषये मे न वस्तव्यम इति…
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Chapter 1

1 [व] कृतॊदकं तु राजानं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः पुरस्कृत्य महाबाहुर उत्तताराकुलेन्द्रियः 2 उत्तीर्य च महीपालॊ बाष्पव्याकुललॊचनः पपात तीरे गङ्गाया वयाधविद्ध इव दविपः 3 तं सीदमानं जग्राह…
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Chapter 22

1 [बर] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम सुभगे सप्त हॊतॄणां विधानम इह यादृशम 2 घराणं चक्षुश च जिह्वा च तवक शरॊत्रं चैव पञ्चमम मनॊ बुद्धिश च…
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Chapter 35

1 [अर्जुन] बरह्म यत परमं वेद्यं तन मे वयाख्यातुम अर्हसि भवतॊ हि परसादेन सूक्ष्मे मे रमते मतिः 2 [वा] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम संवादं मॊक्षसंयुक्तं…
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Chapter 12

1 [वा] दविविधॊ जायते वयाधिः शारीरॊ मानसस तथा परस्परं तयॊर जन्म निर्द्वंद्वं नॊपलभ्यते 2 शरीरे जायते वयाथिः शारीरॊ नात्र संशयः मानसॊ जायते वयाधिर मनस्य एवेति…
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Chapter 11

1 [व] इत्य उक्ते नृपतौ तस्मिन वयासेनाद्भुत कर्मणा वासुदेवॊ महातेजास ततॊ वचनम आददे 2 तं नृपं दीनमनसं निहतज्ञातिबान्धवम उपप्लुतम इवादित्यं स धूमम इव पावकम 3…
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Chapter 15

1 [ज] विजिते पाण्डवेयैस तु परशान्ते च दविजॊत्तम राष्ट्रे किं चक्रतुर वीरौ वासुदेवधनंजयौ 2 [व] विजिते पाण्डवेयैस तु परशान्ते च विशां पते राष्ट्रे बभूवतुर हृष्टौ…
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Chapter 4

1 [य] शुश्रूषे तस्य धर्मज्ञ राजर्षेः परिकीर्तनम दवैपायन मरुत्तस्य कथां परब्रूहि मे ऽनघ 2 [व] आसीत कृतयुगे पूर्वं मनुर दण्डधरः परभुः तस्य पुत्रॊ महेष्वासः परजातिर…
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Chapter 26

1 [बर] एकः शास्ता न दवितीयॊ ऽसति शास्ता; यथा नियुक्तॊ ऽसमि तथा चरामि हृद्य एष तिष्ठन पुरुषः शास्ति शास्ता; तेनैव युक्तः परवणाद इवॊदकम 2 एकॊ…
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Chapter 27

1 [बर] संकल्पदंश मशकं शॊकहर्षहिमातपम मॊहान्ध कारतिमिरं लॊभव्याल सरीसृपम 2 विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रॊधविरॊधकम तद अतीत्य महादुर्गं परविष्टॊ ऽसमि महद वनम 3 [बराह्मणी] कव तद वनं महाप्राज्ञ…
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Chapter 13

1 [वा] न बाह्यं दरव्यम उत्सृज्य सिद्धिर भवति भारत शारीरं दरव्यम उत्सृज्य सिद्धिर भवति वा न वा 2 बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृध्यतः यॊ धर्मॊ यत…
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Chapter 16

1 [ज] सभायां वसतॊस तस्यां निहत्यारीन महात्मनॊः केशवार्जुनयॊः का नु कथा समभवद दविज 2 [व] कृष्णेन सहितः पार्थः सवराज्यं पराप्य केवलम तस्यां सभायां रम्यायां विजहार…
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Chapter 34

1 [बर] नेदम अल्पात्मना शक्यं वेदितुं नाकृतात्मना बहु चाल्पं च संक्षिप्तं विप्लुतं च मतं मम 2 उपायं तु मम बरूहि येनैषा लभ्यते मतिः तन मन्ये…
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Chapter 6

1 [व] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम बृहस्पतेश च संवादं मरुत्तस्य च भारत 2 देवराजस्य समयं कृतम आङ्गिरसेन ह शरुत्वा मरुत्तॊ नृपतिर मन्युम आहारयत तदा 3…
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Chapter 24

1 [बराह्मण] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम नारदस्य च संवादम ऋषेर देवमतस्य च 2 [देवमत] जन्तॊः संजायमानस्य किं नु पूर्वं परवर्तते पराणॊ ऽपानः समानॊ वा वयानॊ…
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Chapter 23

1 [बर] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम सुभगे पञ्च हॊतॄणां विधानम इह यादृशम 2 पराणापानाव उदानश च समानॊ वयान एव च पञ्च हॊतॄन अथैतान वै परं…
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Chapter 40

1 [बर] अव्यक्तात पूर्वम उत्पन्नॊ महान आत्मा महामतिः आदिर गुणानां सर्वेषां परथमः सर्ग उच्यते 2 महान आत्मा मतिर विष्णुर विश्वः शम्भुश च वीर्यवान बुद्धिः परज्ञॊपलब्धिश…
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Chapter 7

1 [स] कथम अस्मि तवया जञातः केन वा कथितॊ ऽसमि ते एतद आचक्ष्व मे तत्त्वम इच्छसे चेत परियं मम 2 सत्यं ते बरुवतः सर्वे संपत्स्यन्ते…
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Chapter 9

1 [इन्द्र] कच चित सुखं सवपिषि तवं बृहस्पते; कच चिन मनॊज्ञाः परिचारकास ते कच चिद देवानां सुखकामॊ ऽसि विप्र; कच चिद देवास तवां परिपालयन्ति 2…
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Chapter 36

1 [बर] तद अव्यक्तम अनुद्रिक्तं सर्वव्यापि धरुवं सथिरम नवद्वारं पुरं विद्यात तरिगुणं पञ्च धातुकम 2 एकादश परिक्षेपं मनॊ वयाकरणात्मकम बुद्धिस्वामिकम इत्य एतत परम एकादशं भवेत…
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Chapter 28

1 [बर] गन्धान न जिघ्रामि रसान न वेद्मि; रूपं न पश्यामि न च सपृशामि न चापि शब्दान विविधाञ शृणॊमि; न चापि संकल्पम उपैमि किं चित…
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Chapter 25

1 [बराह्मण] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम चातुर्हॊत्र विधानस्य विधानम इह यादृशम 2 तस्य सर्वस्य विधिवद विधानम उपदेक्ष्यते शृणु मे गदतॊ भद्रे रहस्यम इदम उत्तमम 3…
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Chapter 20

1 [वा] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम दम्पत्यॊः पार्थ संवादम अभयं नाम नामतः 2 बराह्मणी बराह्मणं कं चिज जञानविज्ञानपारगम दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारम अब्रवीत 3…
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Chapter 29

1 [बर] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भामिनि 2 कार्तवीर्यार्जुनॊ नाम राजा बाहुसहस्रवान येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही 3 स कदा चित…
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Chapter 5

1 [य] कथंवीर्यः समभवत स राजा वदतां वरः कथं च जातरूपेण समयुज्यत स दविज 2 कव च तत सांप्रतं दरव्यं भगवन्न अवतिष्ठते कथं च शक्यम…
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Chapter 30

1 [पितरह] अत्राप्य उदाहरन्तीमम इतिहासं पुरातनम शरुत्वा च तत तथा कार्यं भवता दविजसत्तम 2 अलर्कॊ नाम राजर्षिर अभवत सुमहातपाः धर्मज्ञः सत्यसंधश च महात्मा सुमहाव्रतः 3…
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Chapter 3

1 [व] युधिष्ठिर तव परज्ञा न सम्यग इति मे मतिः न हि कश चित सवयं मर्त्यः सववशः कुरुते करियाः 2 ईश्वरेण नियुक्तॊ ऽयं साध्व असाधु…
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Chapter 39

1 [बर] नैव शक्या गुणा वक्तुं पृथक्त्वेनेह सर्वशः अविच्छिन्नानि दृश्यन्ते रजः सत्त्वं तमस तथा 2 अन्यॊन्यम अनुषज्जन्ते अन्यॊन्यं चानुजीविनः अन्यॊन्यापाश्रयाः सर्वे तथान्यॊन्यानुवर्तिनः 3 यावत सत्त्वं…
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Chapter 19

1 [बर] यः सयाद एकायने लीनस तूष्णीं किं चिद अचिन्तयन पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स निरारम्भकॊ भवेत 2 सर्वमित्रः सर्वसहः समरक्तॊ जितेन्द्रियः वयपेतभयमन्युश च कामहा मुच्यते…
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Chapter 31

1 [बर] तरयॊ वै रिपवॊ लॊके नव वै गुणतः समृताः हर्षः सतम्भॊ ऽभिमानश च तरयस ते सात्त्विका गुणाः 2 शॊकः करॊधॊ ऽतिसंरम्भॊ राजसास ते गुणाः…
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नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

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