गुरु - महिमा

(3 votes)
  • font size
  • 9927 Views



गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान | 
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान ||

अपने सिर की भेंट देकर गुरु से ज्ञान प्राप्त करो | परन्तु यह सीख न मानकर और तन, धनादि का अभिमान धारण कर कितने ही मूर्ख संसार से बह गये, गुरुपद - पोत में न लगे |

 

गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय |
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय ||

व्हेवहार में भी साधु को गुरु की आज्ञानुसार ही आना - जाना चाहिए | सद् गुरु कहते हैं कि संत वही है जो जन्म - मरण से पार होने के लिए साधना करता है |

 

गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त |
वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त ||

गुरु में और पारस - पत्थर में अन्तर है, यह सब सन्त जानते हैं | पारस तो लोहे को सोना ही बनाता है, परन्तु गुरु शिष्य को अपने समान महान बना लेता है |

 

 

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय |
जनम - जनम का मोरचा, पल में डारे धोया ||

कुबुद्धि रूपी कीचड़ से शिष्य भरा है, उसे धोने के लिए गुरु का ज्ञान जल है | जन्म - जन्मान्तरो की बुराई गुरुदेव क्षण ही में नष्ट कर देते हैं |

 

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट |
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ||

गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है, भीतर से हाथ का सहार देकर, बाहर से चोट मार - मारकर और गढ़ - गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकलते हैं |    

 

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान |
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान ||

गुरु के समान कोई दाता नहीं, और शिष्य के सदृश याचक नहीं | त्रिलोक की सम्पत्ति से भी बढकर ज्ञान - दान गुरु ने दे दिया |

 

जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर |
एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर ||

यदि गुरु वाराणसी में निवास करे और शिष्य समुद्र के निकट हो, परन्तु शिष्ये के शारीर में गुरु का गुण होगा, जो गुरु लो एक क्षड भी नहीं भूलेगा |

 

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं |
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं ||

गुरु को अपना सिर मुकुट मानकर, उसकी आज्ञा मैं चलो | कबीर साहिब कहते हैं, ऐसे शिष्य - सेवक को तनों लोकों से भय नहीं है |

 

गुरु सो प्रीतिनिवाहिये, जेहि तत निबहै संत |
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रेम निकट गुरु कंत ||

जैसे बने वैसे गुरु - सन्तो को प्रेम का निर्वाह करो | निकट होते हुआ भी प्रेम बिना वो दूर हैं, और यदि प्रेम है, तो गुरु - स्वामी पास ही हैं |

 

गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर |
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर ||

गुरु की मूरति चन्द्रमा के समान है और सेवक के नेत्र चकोर के तुल्य हैं | अतः आठो पहर गुरु - मूरति की ओर ही देखते रहो |

 

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं|
उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं ||

गुरु की मूर्ति आगे खड़ी है, उसमें दूसरा भेद कुछ मत मानो | उन्हीं की सेवा बंदगी करो, फिर सब अंधकार मिट जायेगा|

 

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास |
गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास ||

ज्ञान, सन्त - समागम, सबके प्रति प्रेम, निर्वासनिक सुख, दया, भक्ति सत्य - स्वरुप और सद् गुरु की शरण में निवास - ये सब गुरु की सेवा से निलते हैं |

 

सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय |
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय ||

सब पृथ्वी को कागज, सब जंगल को कलम, सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते |

 

पंडित यदि पढि गुनि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान |
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परमान ||

‍बड़े - बड़े विद्व्न शास्त्रों को पढ - गुनकर ज्ञानी होने का दम भरते हैं, परन्तु गुरु के बिना उन्हें ज्ञान नही मिलता | ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती |

 

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव|
तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव ||

कबीर साहेब कहते हैं कि भ्रम को छोडो, छोटा बच्चा बनकर गुरु - वचनरूपी दूध को पियो | इस प्रकार अहंकार त्याग कर गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करो, तभी जीव से बचेगा |

 

सोई सोई नाच नचाइये, जेहि निबहे गुरु प्रेम |
कहै कबीर गुरु प्रेम बिन, कितहुं कुशल नहिं क्षेम ||

अपने मन - इन्द्रियों को उसी चाल में चलाओ, जिससे गुरु के प्रति प्रेम बढता जये | कबीर साहिब कहते हैं कि गुरु के प्रेम बिन, कहीं कुशलक्षेम नहीं है |

 

तबही गुरु प्रिय बैन कहि, शीष बढ़ी चित प्रीत |
ते कहिये गुरु सनमुखां, कबहूँ न दीजै पीठ ||

शिष्य के मन में बढ़ी हुई प्रीति देखकर ही गुरु मोक्षोपदेश करते हैं | अतः गुरु के समुख रहो, कभी विमुख मत बनो |

 

अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहिं करै प्रतिपाल |
अपनी ओर निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल ||

मात - पिता निर्बुधि - बुद्धिमान सभी पुत्रों का प्रतिपाल करते हैं | पुत्र कि भांति ही शिष्य को गुरुदेव अपनी मर्यादा की चाल से मिभाते हैं |

 

करै दूरी अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदये |
बलिहारी वे गुरु की हँस उबारि जु लेय ||

ज्ञान का अंजन लगाकर शिष्य के अज्ञान दोष को दूर कर देते हैं | उन गुरुजनों की प्रशंसा है, जो जीवो को भव से बचा लेते हैं |

 

साबुन बिचारा क्या करे, गाँठे वाखे मोय |
जल सो अरक्षा परस नहिं, क्यों कर ऊजल होय ||

साबुन बेचारा क्या करे,जब उसे गांठ में बांध रखा है |जल से स्पर्श करता ही नहीं फिर कपडा कैसे उज्वल हो | भाव - ज्ञान की वाणी तो कंठ कर ली, परन्तु विचार नहीं करता, तो मन कैसे शुद्ध हो |

 

राजा की चोरी करे, रहै रंक की ओट |
कहै कबीर क्यों उबरै, काल कठिन की चोट ||

कोई राजा के घर से चोरी करके दरिद्र की शरण लेकर बचना चाहे तो कैसे बचेगा | इसी प्रकार सद् गुरु से मुख छिपाकर, और कल्पित देवी - देवतओं की शरण लेकर कल्पना की कठिन चोट से जीव कैसे बचेगा |

 

सतगुरु सम कोई नहीं, सात दीप नौ खण्ड |
तीन लोक न पाइये, अरु इकइस ब्रह्मणड ||

सात द्वीप, नौ खण्ड, तीन लोक, इक्कीस ब्रह्मणडो में सद् गुरु के समान हितकारी आप किसी को नहीं पायेंगे |

 

सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय |
धन्य शिष धन भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय ||

सद् गुरु सत्ये - भाव का भेद बताने वाला है | वह शिष्य धन्य है तथा उसका भाग्य भी धन्य है जो गुरु के द्वारा अपने स्वरुप की सुधि पा गया है |

 

सतगुरु मिला जु जानिये, ज्ञान उजाला होय |
भ्रम का भाँडा तोड़ी करि, रहै निराला होय ||

सद् गुरु मिल गये - यह बात तब जाने जानो, जब तुम्हारे हिर्दे में ज्ञान का प्रकाश हो जाये, भ्रम का भंडा फोडकर निराले स्वरूपज्ञान को प्राप्त हो जाये |

 

मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर |
अब देवे को क्या रहा, यो कथि कहहिं कबीर ||

यदि अपना मन तूने गुरु को दे दिया तो जानो सब दे दिया, क्योंकि मन के साथ ही शरीर है, वह अपने आप समर्पित हो गया | अब देने को रहा ही क्या है |

 

जेही खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव |
कहैं कबीर सुन साधवा, करू सतगुरु की सेवा ||

जिस मुक्ति को खोजते ब्रह्मा, सुर - नर मुनि और देवता सब थक गये | ऐ सन्तो, उसकी प्राप्ति के लिए सद् गुरु की सेवा करो |

 

जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान |
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लगा कान ||

दुखों से छूटने के लिए संसार में उपमारहित युक्ति संतों की संगत और गुरु का ज्ञान है | उसमे अत्यंत उत्तम बात यह है कि सतगुरु के वचनों पार कान दो |

 

डूबा औधर न तरै, मोहिं अंदेशा होय |
लोभ नदी की धार में, कहा पड़ा नर सोय ||

कुधर में डूबा हुआ मनुष्य बचता नहीं | मुझे तो यह अंदेशा है कि लोभ की नदी - धारा में ऐ मनुष्यों - तुम कहां पड़े सोते हो |

 

केते पढी गुनि पचि मुए, योग यज्ञ तप लाय |
बिन सतगुरु पावै नहीं, कोटिन करे उपाय ||

कितने लोग शास्त्रों को पढ - गुन और योग व्रत करके ज्ञानी बनने का ढोंग करते हैं, परन्तु बिना सतगुरु के ज्ञान एवं शांति नहीं मिलती, चाहे कोई करोडों उपाय करे |

 

सतगुरु खोजे संत, जीव काज को चाहहु |
मेटो भव के अंक, आवा गवन निवारहु ||

ऐ संतों - यदि अपने जीवन का कल्याण चाहो, तो सतगुरु की खोज करो और भव के अंक अर्थात छाप, दाग या पाप मिटाकर, जन्म - मरण से रहित हो जाओ |

 

यह सतगुरु उपदेश है, जो माने परतीत |
करम भरम सब त्यागि के, चलै सो भव जलजीत ||

यही सतगुरु का यथार्थ उपदेश है, यदि मन विश्वास करे, सतगुरु उपदेशानुसार चलने वाला करम भ्रम त्याग कर, संसार सागर से तर जाता है |

 

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध |
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द ||

जिसका गुरु ही अविवेकी है उसका शिष्य स्वय महा अविवेकी होगा | अविवेकी शिष्य को अविवेकी गुरु मिल गया, फलतः दोनों कल्पना के हाथ में पड़ गये |

 

जनीता बुझा नहीं बुझि, लिया नहीं गौन |
अंधे को अंधा मिला, राह बतावे कौन ||

विवेकी गुरु से जान - बुझ - समझकर परमार्थ - पथ पर नहीं चला | अंधे को अंधा मिल गया तो मार्ग बताये कौन | 

शब्द की महिमा मन की महिमा परमारथ की महिमा सुख - दुःख की महिमा

Please write your thoughts or suggestions in comment box given below. This will help us to make this portal better.

SpiritualWorld.co.in, Administrator
अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

Disclaimer

 

इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
Special Thanks to Dr. Rajni Hans, Ms. Karuna Miglani, Ms. Anisha Arora, Mr. Ashish Hans, Ms. Mini Chhabra & Ms. Ginny Chhabra for their contribution in development of this spiritual website. Privacy Policy | Media Partner | Wedding Marketplace

Vulnerability Scanner

Connect With Us