भक्त कबीर दास जी दोहावली (18)

गुरु - महिमा

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान | बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान || अपने सिर की भेंट देकर गुरु से ज्ञान प्राप्त करो | परन्तु यह सीख न मानकर और तन, धनादि का अभिमान धारण कर कितने ही मूर्ख संसार से बह गये, गुरुपद - पोत…

शब्द की महिमा

शब्द दुरिया न दुरै, कहूँ जो ढोल बजाय |जो जन होवै जौहोरी, लेहैं सीस चढ़ाय || ढोल बजाकर कहता हूँ निर्णय - वचन किसी के छिपाने (निन्दा उपहास करने) से नहीं छिपते | जो विवेकी - पारखी होगा, वह निर्णय - वचनों को शिरोधार्य कर लेगा |

मन की महिमा

कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव |भावै गुरु की भक्ति करू, भावै विषय कमाव || गुरु कबीर जी कहते हैं कि मन तो एक ही है, जहाँ अच्छा लगे वहाँ लगाओ| चाहे गुरु की भक्ति करो, चाहे विषय विकार कमाओ|

भक्ति की महिमा

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त |ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त || की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये | भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच - नीच माने गये किसी भी वर्ण -…

परमारथ की महिमा

मरूँ पर माँगू नहीं, अपने तन के काज |परमारथ के कारने, मोहिं न आवै लाज || मर जाऊँ, परन्तु अपने शरीर के स्वार्थ के लिए नहीं माँगूँगा| परन्तु परमार्थ के लिए माँगने में मुझे लज्जा नहीं लगती|

सुख - दुःख की महिमा

सुख - दुःख सिर ऊपर सहै, कबहु न छाडै संग |रंग न लागै और का, व्यापै सतगुरु रंग || सभी सुख - दुःख अपने सिर ऊपर सह ले, सतगुरु - सन्तो की संगर कभी न छोड़े | किसी ओर विषये या कुसंगति में मन न लगने दे, सतगुरु के चरणों…

संगति की महिमा

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय |दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय || गुरु कबीर जी कहते हैं कि प्रतिदिन जाकर संतों की संगत करो | इससे तुम्हारी दुबुद्धि दूर हो जायेगी और सन्त सुबुद्धि बतला देंगे |

काल की महिमा

कबीर टुक टुक चोंगता, पल पल गयी बिहाय |जिन जंजाले पड़ि रहा, दियरा यमामा आय || ऐ जीव ! तू क्या टुकुर टुकुर देखता है ? पल पल बीताता जाता है, जीव जंजाल में ही पड़ रहा है, इतने में मौत ने आकर कूच का नगाड़ा बजा दिया |

उपदेश की महिमा

काल काल तत्काल है, बुरा न करिये कोय |अन्बोवे लुनता नहीं, बोवे तुनता होय || काल का विकराल गाल तुमको तत्काल ही निगलना चाहता है, इसीलिए किसी प्रकार भी बुराई न करो | जो नहीं बोया गया है, वह काटने को नहीं मिलता, बोया ही कटा जाता है |

जीवन की महिमा

जीवन में मरना भला, जो मरि जानै कोय |मरना पहिले जो मरै, अजय अमर सो होय ||

व्यवहार की महिमा

कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस |टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास || कबीर जी कहते हैं कि इस जवानी कि आशा में पड़कर मद न करो | दस दिनों में फूलो से पलाश लद जाता है, फिर फूल झड़ जाने पर वह उखड़ जाता है, वैसे…

सहजता की महिमा

सहज सहज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं कोय |जिन सहजै विषया तजै, सहज कहावै सोय || सहज - सहज सब कहते हैं, परन्तु उसे समझते नहीं जिन्होंने सहजरूप से विषय - वासनाओं का परित्याग कर दिया है, उनकी निर्विश्ये - स्थिति ही सहज कहलाती है|

सति की महिमा

साधु सती और सूरमा, इनका मता अगाध |आशा छाड़े देह की, तिनमें अधिका साध || सन्त, सती और शूर - इनका मत अगम्य है| ये तीनों शरीर की आशा छोड़ देते हैं, इनमें सन्त जन अधिक निश्चय वाले होते होते हैं |

निष्काम की महिमा

संसारी से प्रीतड़ी, सरै न एको काम |दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम || संसारियों से प्रेम जोड़ने से, कल्याण का एक काम भी नहीं होता| दुविधा में तुम्हारे दोनों चले जयेंगे, न माया हाथ लगेगी न स्वस्वरूप स्तिथि होगी, अतः जगत से निराश होकर अखंड वैराग्ये करो|

साधु - महिमा

कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय |अंक भरे भरि भेरिये, पाप शरीर जाय || वो दिन बहुत अच्छा है जिस दिन सन्त मिले | सन्तो से दिल खोलकर मिलो , मन के दोष दूर होंगे |

सद्आचरण की महिमा

माँगन गै सो मर रहै, मरै जु माँगन जाहिं |तिनते पहिले वे मरे, होत करत हैं नहिं || जो किसी के यहाँ मांगने गया, जानो वह मर गया | उससे पहले वो मरगया जिसने होते हुए मना कर दिया |

आचरण की महिमा

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस |ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस || जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं वे ज्ञान - मोती कैसे चुगेगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं |

सेवक की महिमा

सवेक - स्वामी एक मत, मत में मत मिली जाय |चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय || सवेक और स्वामी की पारस्परिक मत मिलकर एक सिद्धांत होना चहिये | चालाकी करने से सच्चे स्वामी नहीं प्रसन्न होते, बल्कि उनके प्रसन्न होने का कारण हार्दिक भक्ति - भाव होता है…
 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

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