बसंत पंचमी
अंगारों की तरह दिखते पलाश के फूल, आम के पेड़ों पर आये बौर, हरियाली से ढकी धरती और चारो और पीली सरसों बसंत ऋतु के शुभ आगमन की बधाई देते हैं वास्तव में बसंत पंचमी ऋतु परिवर्तन का ऐसा त्यौहार है| जो अपने साथ मद-मस्त परिवर्तन लेकर आती है| Read More

भक्त कबीर दास जी (Bhagat Kabir Das Ji)

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भूमिका:

संत कबीर (Sant Kabir Ji) का स्थान भक्त कवियों में ध्रुव तारे के समान है| जिनके शब्द, साखी व रमैनी आज भी उतने ही प्रसिद्ध हैं जितने कि उनके समय में थे| 

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परिचय:

भक्त कबीर (Sant Kabir Ji) का जन्म संवत 1455 जेष्ठ शुक्ल 15 को बताया जाता है| यह भी कहा जाता है कि जगदगुरु रामानंद स्वामी (Ramanand Swami Ji) के आशीर्वाद से काशी में एक विधवा ब्रह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए| लाज के मारे वह नवजात शिशु को लहरतारा के तालाब के पास फेंक आई| नीरू नाम का एक जुलाहा उस बालक को अपने घर में ले आया| उसी ने बालक का पालन-पोषण किया| यही बालक कबीर (Sant Kabir Ji) कहलाया| 

कुछ कबीरपंथियों का मानना है कि कबीर (Sant Kabir Ji) का जन्म काशी के लहरतारा तालाब में कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ| यह भी कहा जाता है कि कबीर (Sant Kabir Ji) की धर्म पत्नी का नाम लोई था| उनके पुत्र व पुत्री के नाम 'कमाल' व 'कमाली' था| संत कबीर (Sant Kabir Ji) पढ़े - लिखे नहीं थे| उन्होंने स्वयं कहा है -

मसि कागद छूवो नहीं,
कलम गहो नहिं हाथ|

परिवार के पालन पोषण के लिए कबीर (Sant Kabir Ji) को करघे पर खूब मेहनत करनी पड़ती थी| उनके घर साधु - संतो का जमघट लगा रहता था| ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन एक पहर रात को कबीर जी (Sant Kabir Ji) पञ्चगंगा घाट की सीढ़ीयों पर जा लेटे| वहीं से रामानंद जी भी स्नान के लिए उतरा करते थे| रामानंद जी का पैर कबीर जी के ऊपर पड़ गया| रामानंद जी एक दम "राम-राम" बोल उठे कबीर (Sant Kabir Ji) ने इनके बोलो को ही गुरु की दीक्षा का मंत्र मान लिया| वे स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु कहने लगे| उनके अनुसार -
हम काशी में प्रगट भये हैं, रामानन्द चेताये |

कुछ लोगो का यह भी कथन है कि कबीर जी (Sant Kabir Ji) जन्म से मुसलमान मान थे और समझदारी की उम्र पाने पर स्वामी रामानन्द के प्रभाव में आकर हिन्दू धर्म की बातें जानी| मुसलमान कबीरपंथियों की मान्यता है कि की कबीर (Sant Kabir Ji) ने मुसलमान फकीर शेख तकी से दीक्षा ली| 

हकीकत चाहे कुछ भी हो, मान्यताये चाहे अलग-अलग हों, पर इस बात से सभी सहमत हैं कि कबीर जी (Sant Kabir Ji) ने हिन्दू - मुसलमान का भेद - भाव मिटाकर हिन्दू संतो और मुसलमान फकीरों का सतसंग किया| उन्हें जो भी तत्व प्राप्त हुआ उसे ग्रहण करके अपने पदों के रूप में दुनिया के सामने रखा| वह निराकार ब्रह्मा के उपासक थे| उनका मानना था कि ईश्वर घर-घर में व सबके मन में बसे हैं| ईश्वर की प्रार्थना हेतु मन्दिर - मसजिद में जाना आवश्यक नहीं| 

साहितयक देन:

कबीर (Sant Kabir Ji) की बाणी का संग्रह "बीजक" नाम से प्रसिद्ध है| इसके तीन भाग हैं - 

  • रमैनी
  • सबद
  • साखी

इनकी भाषा खिचड़ी है - पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रज भाषा आदि कई बोलियों का मिश्रण मिलता है| कबीर जी (Sant Kabir Ji) बाहरी आडम्बर के विरोधी थे| उन्होंने समान रूप से हिन्दू - मुस्लिम मान्यताओ में बाहरी दिखावे पर अपने दोहों के द्वारा जमकर चोट की है| इनके दोहों में अधिक ग्रामीण जीवन की झलक देखने को मिलती है| अपने दोहों के द्वारा इन्होंने समाज में फैली कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया है| 

कबीर जी (Sant Kabir Ji) अपने अन्तिम समय में काशी से मगहर नामक स्थान पर आ गए| यहीं 119 वर्ष की आयु में इन्होंने शरीर छोड़ा| 

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