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सुग्रीव से मित्रता (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

सुग्रीव से मित्रता (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

सूर्यदेव से शिक्षा प्राप्त करके हनुमान जी वापस कांचनगिरी पर पहुंचे| माता अंजना, पिता केसरी उन्हें सम्मुख पाकर बहुत हर्षित हुए| हनुमान कुछ दिन अपने माता-पिता के पास रुके| फिर एक दिन उन्होंने अपनी इच्छा बताई – “पिताजी! मुझे भगवान सर्य ने आदेश दिया है कि मैं किष्किंधा पहुंचकर सुग्रीव से मिलूं और भविष्य में उन्हीं के पास रहकर उनकी सेवा करूं|”

माता अंजना बोलीं – “पुत्र! अभी तो मेरा दिल भी नहीं भरा है| कुछ दिन माता के पास भी रुको|”

पिता केसरी बोले – “हां पुत्र! तुम हमारी एकमात्र संतान हो| तुम नहीं जानते, जब तुम हमसे दूर होते हो तो हमारे दिलों में तुम्हारे प्रति कैसी-कैसी भावनाएं उठती हैं|”

हनुमान जी बोले – “पिताजी! मैं समय-समय पर आप लोगों से मिलने आता रहूंगा| आप तो जानते ही हैं, गुरु का दर्जा माता-पिता से भी उच्च होता है और भगवान सूर्यदेव का यही आदेश है|”

केसरी बोले – “यह तो ठीक है पुत्र! लेकिन हम चाहते हैं कि तुम्हारा विवाह कर दें, ताकि अपनी पत्नी के साथ खुशी-खुशी सुग्रीव के पास जाकर रह सको|”

हनुमान जी बोले – नहीं पिताजी! मैं विवाह के बंधन में नहीं फंसूंगा| मैंने प्रण किया है कि मैं आजन्म अविवाहित रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा|”

हनुमान जी की बात सुनकर माता-पिता के चेहरे पर कुछ निराशा-सी छा गई| लेकिन पुत्र के चेहरे पर दृढ़ता के भाव देखकर दोनों खामोश हो गए| केसरी बोले – “ठीक है पुत्र! जैसा तुम ठीक समझो वही करो| कल मैं तुम्हें लेकर किष्किंधा चलूंगा| किष्किंधापति बालि मेरा मित्र है| सुग्रीव उसी का छोटा भाई है|”

कुछ दिनों बाद केसरी हनुमान जी को लेकर किष्किंधा पहुंचे| बालि ने खुले हृदय से उनका स्वागत किया| सुग्रीव से हनुमान जी यों लिपटे, जैसे वर्षों का बिछड़ा कोई मित्र मिला हो|

केसरी हनुमान जी को बालि के सुपुर्द करके वापस लौट गए| कुछ ही दिनों में बालि के पुत्र अंगद और सुग्रीव से हनुमान जी की मैत्री हो गई, लेकिन हनुमान जी विशेष रूप से सुग्रीव से प्रगाढ़ मैत्री चाहते थे| क्योंकि भगवान सूर्यदेव का यही आदेश था| समान विचार और आदतों के कारण शीघ्र ही दोनों में प्रगाढ़ मित्रता हो गई और उनका अधिकांश समय साथ-साथ बीतने लगा| बालि अपने छोटे भाई सुग्रीव से बहुत प्यार करता था| हालांकि उनकी उत्पत्ति अलग-अलग दो के आशीर्वाद से हुई थी| वानरराज बालि देवराज इंद्र के वरदान स्वरूप और सुग्रीव भगवान सूर्य के वरदान स्वरूप पैदा हुए थे| यही कारण था कि सूर्यदेव ने हनुमान जी को सुग्रीव के पास जाकर उनकी सेवा करने को कहा|

फिर एक घटनावश बालि और सुग्रीव में इतनी घोर शत्रुता पैदा हो गई कि बालि अपने भाई के खून का प्यासा बन गया| ऐसे समय में हनुमान जी ने अपने बुद्धि चातुर्य और विवेक से सुग्रीव की रक्षा की| नि:संदेह बालि एक महान योद्धा था| यद्ध में उसने रावण तक को परास्त करके उसे बंदी बनाया था और जब उसे अपमानित करके छोड़ा तो उसी का बदला लेने के लिए मंदोदरी का भाई मायावी वहां पहुंचकर बालि को युद्ध के लिए ललकारने लगा – “बालि! तू शायद मेरे बहनोई दशानन को परास्त करके स्वयं को भारी वीर समझने लगा है| सुन, मेरा नाम मायावी है| हिम्मत हो तो मुझे परास्त करके दिखा|”

ऐसा कहकर बालि ने उस पर मुष्टि प्रहार कर दिया| मायावी भी बलवान था| दोनों आपस में भिड़ गए और घनघोर युद्ध छिड़ गया| लेकिन बालि के मुष्टि प्रहारों से घबराकर मायावी का हौसला पस्त होने लगा| वह जान बचाने के लिए भाग निकला|

भागते-भागते मायावी एक गुफा में जा घुसा| बालि, सुग्रीव व हनुमान जी तीनों गुफा के द्वार पर पहुंचकर रुक गए| बालि सुग्रीव से बोला – “मैं अंदर जाकर उस दुष्ट का दमन करता हूं| तुम लोग यहीं गुफा के द्वार पर मेरी प्रतीक्षा करना और यदि मैं एक माह तक गुफा से बाहर न आऊं तो समझ लेना मेरा मायावी ने वध कर दिया|”

बालि की बात सुनकर सुग्रीव बोला – “भैया! हम दोनों भी आपके साथ चलेंगे| हम तीनों उसे आसानी से परास्त कर देंगे|”

बालि बोला – “नहीं सुग्रीव! उसने चुनौती मुझे दी है| इसलिए मैं अकेला ही अंदर जाऊंगा और अकेले उस भगोड़े से युद्ध करूंगा| तुम निश्चित समय तक यहीं रुककर मेरी प्रतीक्षा करना|

यह कहकर बालि अकेला ही गुफा में जा घुसा और मायावी से युद्ध करने लगा| दिन पर दिन बीतते गए, लेकिन बालि वापस न लौटा| गुफा के अंदर से उठा-पटक, चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती रहीं| फिर निश्चित दिन भी आ गया| एक माह बीत गया|

एक दिन गुफा से एक मरणांतक चीख उभरी, साथ ही रक्त की तेज धारा बहकर गुफा से बाहर पहुंची| यह देख सुग्रीव आश्चर्य से बोला – “ये क्या, खून की धारा! ओह, लगता है उस दुष्ट ने मेरे भैया को मार डाला है|”

हनुमान जी बोले – “इतनी जल्दी अनुमान मत लगाओ, हो सकता है कि बालि ने उस दुष्ट को ही मार डाला हो|”

सुग्रीव बोला – “लेकिन हनुमान वह मरणांतक चीख किसी वानर के गले से ही निकली हो सकती है| मैं वानरों की चीख को पहचानता हूं| उससे पहले कि वह दुष्ट बाहर आकर नगर में उपद्रव मचाए, क्यों न उसे इस गुफा में बंद करके वापस चलें|”

यह कहकर सुग्रीव ने एक बड़ी-सी सिला से गुफा का द्वार बंद कर दिया और हनुमान जी के साथ नगर पहुंचकर अंगद और उनकी माता को यह समाचार सुनाया|

उधर बालि मायावी को मारकर गुफा के द्वार पर पहुंचा तो उसने गुफा का द्वार बंद पाया| उसने दरवाजे पर लगी शिला को हटाना चाहा, लेकिन शिला अपनी जगह से हिली तक नहीं| यह देख बालि को क्रोध आ गया| वह मन-ही-मन सोचने लगा – ‘कहीं सुग्रीव मुझे गुफा में इसलिए तो बंद नहीं कर गया कि मैं भूखा-प्यासा दम तोड़ दूं और वह राज्य का आनंद उठाए?’

यह सोचकर बालि ने पूरी शक्ति लगाकर शिला को खिसकाया और बाहर निकलकर क्रोधित होता हुआ नगर पहुंचा और सीधा राज दरबार की ओर बढ़ गया, जहां गद्दी पर बैठा सुग्रीव अपने सभासदों से मंत्रणा कर रहा था| वह चिल्लाया – ‘सुग्रीव!”

सभा में सन्नाटा छा गया| हर व्यक्ति अपनी जगह से उठ खड़ा और दौड़कर बालि के चरणों में गिर गया| बोला – भैया, तुम जिदा हो?”

बालि क्रोधित होकर बोला – “हां, जिंदा हूं| वैसे तूने तो मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी| तभी तो गुफा का द्वार मजबूत शिला से बंद कर आया था| तेरी नीयत आरंभ में ही खोटी थी| न जाने कब से राजगद्दी पर बैठने के सपने देख रहा था| तुझे अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा| मैं तुझे अभी राजपाट भोगने का मजा चखाता हूं|”

हनुमान जी ने बालि को बहुत समझाया, लेकिन उसने उनकी एक न सुनी और सुग्रीव पर मुष्टि प्रहार कर दिया, जिससे सुग्रीव आहत होकर नीचे गिर गया| फिर वह उठा और जान बचाने के लिए बाहर भागा| भागते-भागते सुग्रीव ने मतंग पर्वत पर पहुंचकर ही दम लिया| हनुमान जी भी पीछे पीछे वहां जा पहुंचे| वे चाहते तो बालि का मान-मर्दन कर सकते थे, लेकिन दो भाइयों के झगड़े में उन्होंने तटस्थ रहना ही ज्यादा अच्छा समझा|

सुग्रीव ने शिकायत के स्वर में कहा – “पवनपुत्र, आपने भी मेरी कोई मदद नहीं की| भैया तो मुझे मार डालने पर उतारू थे| अभी भी वह पर्वत के नीचे खड़े मेरे उतरने का इंतजार कर रहे हैं|”

हनुमान जी बोले – “मैं दो भाइयों के झगड़े में कैसे दखल देता? देर-सबेर जब बालि को अपनी भूल का अहसास होगा, तब फिर वह पश्चाताप करेगा| ऐसे में मेरा दखल देना उचित नहीं होता|”

सुग्रीव बोला – “लेकिन अब हम रहेंगे कहां? नीचे तो बालि खड़ा मेरे खून का प्यास हो रहा है|”

हनुमान जी बोले – “बालि इस पर्वत पर नहीं आ सकता| उसे महर्षि मतंग ने शाप दिया है| कि अगर वह इस पर्वत पर चढ़ा तो उसके सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे|”

तब से हनुमान जी सुग्रीव के साथ उसी पर्वत पर रहने लगे| वे सुग्रीव की हर तरह से सेवा करते| उसके भोजन का प्रबंध, नगर से समाचार लाना आदि हनुमान जी के ही जिम्मे था| एक दिन हनुमान जी ने लौटकर बताया – “तुम्हारे साथ भाग्य की बड़ी विडंबना हो रही है सुग्रीव! बालि ने तुम्हारी सब चीजों पर कब्जा कर लिया है| तुम्हारी पत्नी को भी उसने बंदी बना लिया है| लेकिन तुम दिल छोटा मत करो, देर-सबेर बालि को बुद्धि आ ही जाएगी और वह तुम्हें क्षमा कर देगा|”

लेकिन सुख की तरह दुख भी चिरस्थाई नहीं होता| इसलिए सुग्रीव के भी दिन फिरे| पर्वत पर बैठे हनुमान जी और सुग्रीव ने राम-लक्ष्मण को सीता की खोज में आते देखा तो सुग्रीव डर गया और आशंकित होकर हनुमान जी से बोला – “पवनसुत! देखो तो पर्वत के नीचे इसी ओर आते दो तपस्वी दिखाई दे रहे हैं| कहीं वे बालि के भेजे हुए दूत तो नहीं हैं? तुम वेश बदलकर उनके पास पहुंचो और यह मालूम करो कि ये दोनों कौन हैं और यहां क्या कर रहे हैं? सावधान रहना कहीं वे तुम पर ही आक्रमण न कर दें|”

हनुमान जी ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और राम-लक्ष्मण के पास जा पहुंचे| ब्राह्मण जानकर राम-लक्ष्मण ने उन्हें प्रणाम किया| ब्राह्मण वेशधारी हनुमान जी ने पूछा – “आप लोग कौन हैं? वस्त्र तो आप दोनों ने तपस्वियों जैसे पहने हुए हैं, लेकिन कंधे पर धनुष-बाण धनुर्धरों जैसे धारण किए हैं?”

श्रीराम बोले – “हम लोग कौशल नरेश के पुत्र हैं| हमारे पिता का नाम दशरथ है| मैं बड़ा हूं, मेरा नाम राम है और ये मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है| हम अपने पिता के आदेश का पालन कर रहे हैं| हमें चौदह वर्ष तक वनगमन की आज्ञा हुई है| लेकिन यहां पहुंचकर हम भारी मुसीबत में फंस गए हैं| मेरी पत्नी सीता का किसी ने अपहरण कर लिया है| हम उन्हीं को जंगलों और पवर्तों में खोज रहे हैं|

हनुमान जी बोले – “यह तो बहुत बुरा हुआ| यह जंगल अनेक दैत्यों तथा मायावी असुरों से भरा पड़ा है| कोई नहीं जानता कि कब, कौन राक्षस उस पर हमला कर दे| आप दोनों मेरे साथ चलिए| मेरे एक मित्र हैं जो इस मामले में आपकी तरह से मदद कर सकते हैं|”

श्रीराम बोले – “लेकिन आपने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया विप्रवर! आप कौन हैं और आपके मित्र का क्या नाम है?”

हनुमान जी ने अपना ब्राह्मण वेश त्याग दिया और प्रणाम करके कहा – “क्षमा कीजिए, यह वेश मुझे आपकी जानकारी प्राप्त करने के लिए धारण करना पड़ा है| मैं हनुमान हूं| केसरी मेरे पिता हैं और अंजना मेरी माता हैं| मेरे मित्र का नाम सुग्रीव है, जो इस राज्य के स्वामी बालि के छोटे भाई हैं|”

हनुमान का परिचय जानकर श्रीराम बोले – “आपका बहुत धन्यवाद हनुमान जी! इस घनघोर जंगल में आप जैसा सहायक और सुग्रीव जैसा मित्र पाकर मुझे अति प्रसन्नता होगी| आप मुझे उनके पास ले चलिए|”

हनुमान राम-लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले आए और उनसे परिचय कराया| सुग्रीव ने राम और राम ने सुग्रीव की मुसीबत की व्यथा-कथा सुनी| सुग्रीव ने सीता को खोज निकालने का आश्वासन दिया| जबकि राम ने बालि को मारकर सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाने का वादा किया|

हनुमान के माध्यम से सुग्रीव और राम की मैत्री एक मील का पत्थर सिद्ध हुई और इसका श्रेय पवनसुत हनुमान जी को मिला| क्योंकि उन्होंने ही राम की सुग्रीव से मित्रता करवाई थी|

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