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रावण का यज्ञ विध्वंस (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

रावण का यज्ञ विध्वंस (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

लंकाधीश रावण क्रोध से दांत किटकिटा रहा था| उसके सारे प्रमुख बलशाली योद्धा युद्ध में मारे जा चुके थे| पुत्र मेघनाद, कुंभकर्ण और अहिरावण की मृत्यु ने उसका मनोबल तोड़कर रख दिया था| किंतु वह अब भी अपने हठ पर कायम था और किसी भी हालत में श्रीराम से समझौता करना नहीं चाहता था| अगले दिन उसने स्वयं ही समर-भूमि में पहुंचकर युद्ध करने का निर्णय कर लिया था, लेकिन युद्ध भूमि में उतरने से पहले वह देवी कालरात्रि की पूजा करके उसे प्रसन्न करना चाहता था| अत: वह देवी कालरात्रि के मंदिर में पहुंचकर पूजा करने लगा| ऐसे कार्यों के लिए उसने विशेष तौर पर लंका में शैव, शाक्त और तांत्रिक ब्राह्मण बसा रखे थे|

विभीषण ने पहले से ही अपने गुप्तचर लंका में छोड़े हुए थे, जो कि उसे लंका के हालात को बता जाते हैं| लंकाधीश के देवी आराधना पर बैठने के बाद एक दूत विभीषण के पास आकर बोला – “विभीषण जी! दशानन आज रात देवी कालरात्रि की आराधना पर बैठ गया है| दुर्गा सप्तशती का संपुट सहित पाठ पूर्ण होते ही वह कल प्रबल वेग से हल्ला बोलेगा|”

गुप्तचर की बात सुनकर विभीषण शिविर में पहुंचा और हनुमान जी के निकट पहुंचकर बोला- “हनुमान जी! अभी-अभी मुझे एक बहुत ही चिंताजन बात मालूम हुई है| मेरा एक दूत मुझे सूचित करके गया है कि रावण देवी कालरात्रि की आराधना कर रहा है| यदि यह यज्ञ पूरा हो गया तो वह अजेय हो जाएगा| इस यज्ञ का विध्वंस होना बहुत आवश्यक है, लेकिन इसमें एक खतरा और भी है|”

हनुमान जी बोले – “कैसा खतरा विभीषण जी? स्पष्ट कहिए| मुझे किसी खतरे की परवाह नहीं है| प्रभु राम की कृपा से मैं हर खतरे का मुकाबला कर सकता हूं|”

विभीषण बोला – “खतरा यह है कि यज्ञ विध्वंस करने से यदि देवी रुष्ट हो गई तो उसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं| क्योंकि देवी राक्षसों की ही नहीं, अपितु देव, मानव, किन्नर, गंधर्व आदि सभी जातियों की पूजनीय हैं|”

हनुमान जी बोले – “आप निश्चिंत रहिए| मैं इस यज्ञ को पूर्ण नहीं होने दूंगा| साथ ही देवी माता से आशीर्वाद भी लूंगा|”

विभीषण ने कहा – “तब तो शीघ्रता कीजिए पवनपुत्र! अन्यथा देरी हो गई तो काम अपूर्ण रह जाएगा| एक बात और भी है, रावण के इस यज्ञ को कुछ ब्राह्मण पूरा कर रहे हैं, जो लंकापुरी में ही रहते हैं|”

हनुमान जी बोले – “तब तो काम बन गया| मैं उन ब्राह्मणों में जा मिलूंगा और उन्हीं के द्वारा यह यज्ञ पूरा करूंगा|”

विभिष्ण से विदा लेकर हनमान जी लघु आकार धारण करके उस जगह जा पहुंचे जहां ब्राह्मण यज्ञ की तैयारी कर रहे थे| उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण किया और पूजा में ब्राह्मणों की मदद करने लगे| उनके मृदु व्यवहार को देखकर ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य हुआ| एक बूढ़े ब्राह्मण ने पूछ ही लिया – “सच बताइए विप्रवर, आप कौन हैं और किस प्रयोजन हेतु हम लोगों में शामिल हुए? आप लंकापुरी के तो हैं नहीं, क्योंकि यहां के समस्त ब्राह्मणों को हम जानते हैं| आप जरूर किसी दूसरी जगह से आए हैं|”

हनुमान जी बोले – “विप्रवर! आप लोगों का अनुमान सही है| मैं ब्राह्मण नहीं हूं| मैं तो श्रीराम का सेवक हनुमान हूं| एक विशेष कार्य हेतु यहां आया हूं| मैं चाहता हूं कि आप लोग मेरे इस कार्य में मदद करें|

एक ब्राह्मण बोला – “हम क्या मदद कर सकते हैं? हम तो रावण के वेतनभोगी ब्राह्मण हैं|”

हनुमान जी ने कहा – “आप ही तो मदद कर सकते हैं विप्रवर। आप लोगों को यह तो भलीभांति ज्ञात है कि श्रीराम जो कुछ कर रहे हैं वह सब ब्राह्मण और सज्जन पुरुषों की भलाई के लिए है| रावण का मार्ग सरासर अधर्म का है, जबकि श्रीराम विश्व में धर्म ध्वजा फहराने की चेष्टा कर रहे हैं|”

ब्राह्मण बोले – “आप कह तो ठीक रहे हैं| लेकिन जब रावण को पता चलेगा कि हमने तुम्हारी मदद की है तो वह हमें खा नहीं जाएगा? नहीं बाबा, हम तुम्हारी मदद नहीं कर सकते|”

हनुमान जी ने उन्हें अनेक ढंग से प्रभावित किया| अंत में एक बूढ़ा ब्राह्मण राजी हो गया| वह बोला – “ठीक है, लेकिन हमें करना क्या होगा?”

हनुमान जी बोले – “सहस्र चंडी पाठ के प्रथम मंत्र ‘हरिणी’ शब्द के बजाय ‘कारिणी’ कहने से मंत्र का उद्देश्य बदल जाता है| आप लोगों को ‘हरिणी’ के बजाय ‘कारिणी’ मंत्र पढ़ते रहना है| इस तरह देवी की आराधना पूरी हो सकेगी|”

बूढ़ा ब्राह्मण बोला – “मैं समझ गया| जब आराधना पूरी न होगी तो देवी प्रकट नहीं होगी और न ही रावण अजेय होने का वरदान प्राप्त कर सकेगा|”

ब्राह्मणों ने वैसा ही किया| वे गलत मंत्र उच्चारण करते रहे| फलस्वरूप देवी प्रकट न हुई| इससे पूजा पर बैठा रावण झल्लाकर ब्राह्मणों से बोला – “ब्राह्मणो! इतनी आराधना करने के पश्चात भी देवी प्रकट क्यों नहीं हो रही है?”

ब्राह्मणों ने कहा – “राजन! हम कैसे कह सकते हैं| देवी आपसे रुष्ट है शायद|”

यह सुनकर और झल्लाकर रावण यज्ञ वेदी से उठ खड़ा हुआ और क्रोध से उफनता हुआ अपने महल में चला गया| रावण के जाते ही ब्राह्मण भी उठ खड़े हुए| हनुमान जी ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा – “आज आप लोगों की कृपा और सहयोग से यह कार्य संपन्न हो सका है विप्रगण| विश्वास रखिए, अब आप लोगों को मुक्त होने में ज्यादा विलंब न होगा और शीघ्र ही लंकापुरी में धर्म राज्य स्थापित हो जाएगा। फिर आप आर्यावर्त के ब्राह्मणों की तरह पठन-पाठन, यज्ञ पूजा-पाठ आदि करने के लिए स्वतंत्र होंगे| इस देश में ब्राह्मणों का मान-सम्मान बढ़ेगा|”

तत्पश्चात ब्राह्मणों ने बड़े प्रेम से हनुमान जी को विदा किया| इस तरह हनुमान जी के बुद्धिचातर्य से रावण अपने उद्देश्य में सफल न हो सका|

अगले दिन जब रावण युद्ध भूमि में पहुंचा तो उसकी पहली भिडंत हनुमान जी से हुई| दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया| रावण ने अपनी गदा हनुमान जी पर चला दी, लेकिन हनुमान जी ने उसका वार विफल कर दिया और अपनी गदा का एक भरपूर प्रहार रावण के कंधे पर कर दिया| वार करारा था, रावण पलभर के लिए किंर्त्तव्यविमूढ़ होकर रह गया| फिर वह दुगने वेग से आगे बढ़ा और हनुमान जी पर टूट पड़ा| लेकिन हनुमान जी भी कम न थे| उन्होंने झुकाई देकर रावण के वार को रोककर एक वज्र समान घूंसा उसके सिर पर जड़ दिया, जिससे रावण अचेत होकर नीचे गिर पड़ा| तुरंत राक्षस सेनापतियों ने उसके इर्द-गिर्द घेरा डाल दिया|

फिर राक्षसों का एक विशाल समूह अकेले हनुमान जी से युद्ध करने लगा| हनुमान जी को राक्षसों के घेरे में फंसा देख सुग्रीव अनेक योद्धाओं के साथ उसकी सहायता को आगे बढ़ा और राक्षसों से युद्ध करने लगा| सहायता पाकर हनुमान जी दुगुने जोश से राक्षसों से लड़ने लगे और उनकी गदा तथा मुष्टि प्रहार से आतंकित होकर राक्षस मैदान छोड़कर भागने लगे| तब तक रावण होश में आ चुका था और उसने वानर सेना पर बाण वर्षा करनी आरंभ कर दी थी| वानर सेना के पांव उखड़ने लगे|

यह देख श्रीराम तुरंत रावण के सम्मुख जा खड़े हुए| दोनों ओर से अग्नि बाण छूटने लगे| आकाश तीरों से ढक गया| दिन में ही रात नजर आने लगी| राम जितने भी तीर मारते रावण तुरंत उन्हें काट डालता और विकट अट्टहास करते हुए धड़ाधड़ तीरों की झड़ी लगा देता| राम के तीरों से उसका सिर कटता और फिर नया सिर उसके कटे सिर के ऊपर पैदा हो जाता| तभी विभीषण श्रीराम के पास पहुंचा और उनके कान में फुसफुसाते हुए बोला – “रावण इस तरह नहीं मरेगा प्रभु! रावण की नाभि में अमृत भरा हुआ है, जिससे वह अमर है| जितनी भी बार आप उसके सिरों को काटेंगे, अमृत के कारण तुरंत नए पैदा हो जाएंगे| पहले आप इसकी नाभि में छिपे अमृत को सुखा दीजिए| फिर रावण के मरने में देर नहीं लगेगी|”

विभीषण द्वारा बताए भेद को जानकर श्रीराम ने एक अग्निबाण उठाया और निशाना लगाकर रावण की नाभि पर मार दिया| बाण लगते ही रावण धरती पर गिर पड़ा| अग्निबाण ने उसकी नाभि में छिपे अमृत को सुखा दिया| नाभि के सूखते ही रावण की शक्ति समाप्त हो गई| राम ने दूसरा बाण मारा, जो उसके सिर को काटकर दूसरी ओर ले उड़ा| फिर उसने दम तोड़ दिया| वानर सेना खुशी से नाचने लगी| हर्षित होकर देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की| इस तरह अधर्म पर धर्म की जीत हुई और इसमें पवनपुत्र हनुमान जी का बहुत बड़ा योगदान रहा|

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