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मैं यही रहूंगा (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

मैं यही रहूंगा (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

समुद्र पार जाने के लिए पुल के निर्माण का काम प्रगति पर था| राम की सेना उत्साह से फूली नहीं समा रही थी| भालू-वानर भाग-भागकर काम कर रहे थे| तभी गजब हो गया| पुल बनाने वाले नल-नील ने ऐलान कर दिया – “पुल का काम अब आगे नहीं बढ़ सकता| उसे बीच में रोकना होगा|”

“क्यों?” सबके मुंह से एक साथ निकला| सब नल-नील के चिंतित चेहरों की ओर देखने लगे|

तभी भगवान श्रीराम भी स्थिति का जायजा लेने वहां पहुंच गए| वह सोच रहे थे, ‘ऐसी क्या बात हो गई, जो काम सुचारू रूप से चल रहा था, उसमें ऐसी क्या बाधा उपस्थित हुई कि निर्माण कार्य को ही रोकना पड़ रहा है?’

रामदूत हनुमान जी कब पीछे रहने वाले थे| वह भी निर्माण कार्य रुकने की बात सुनकर वहां उपस्थित हो गए| सुग्रीव, अंगद, जांबवंत, लक्ष्मण सभी चिंतातुर होकर नल-नील को घेरकर खड़े थे|

“पत्थरों की कमी पड़ गई है|” नल-नील ने कहा – “यह तो कहिए कि राम नाम लिखे रहने से चट्टानों के टुकड़े ऊपर ही ऊपर तैरते रहे| कोई समुद्र तल में नहीं समाया, वरना पुल के निर्माण की सामग्री कभी की समाप्त हो गई होती| पर अब काम आगे नहीं चलने का| ये बंदर इक्के-दुक्के, छोटे-मोटे पत्थर लिए दौड़े चले आते हैं| इनसे क्या होगा?”

“क्यों?” स्वभाव से क्रोधी लक्ष्मण की भौंहें टेढ़ी हुईं – “वानर भालू काम नहीं कर रहे?”

“क्या बात है?” सेनापति सुग्रीव की भौंहों पर भी बल पड़ गए|

“हनुमान! तुम इसके कारण का पता करो|” सदा प्रसन्न और शांत रहने वाले श्रीराम ने अपना निर्णय सुनाया – “शीघ्रता से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए| हमारी सेना में कोई भी आलसी अथवा कामचोर नहीं है| कुछ बात अवश्य होगी|”

“महाराज! कारण का पता लग गया|” हनुमान जी ने थोड़ी ही देर में श्रीराम से आकर कहा|

“क्या कारण है?” श्रीराम ने पूछा|

“दक्षिण के सारे पर्वत पुल निर्माण के कार्य में आ गए| अब वानर भी क्या करें? चट्टान का कोई टुकड़ा अब इस प्रदेश में कहीं ढूंढे नहीं मिल रहा है|”

“तब?” राम के चेहरे पर चिंता की रेखा गहरी हुईं| पर रामभक्त अविचल रहे| वह भगवान श्रीराम के मुख की ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे|

“क्यों, सारा बना-बनाया खेल बिगड़ रहा है और तुम हंसते जा रहे हो?” श्रीराम तनाव में आकर बोले|

हनुमान जी ने गंभीरता से कहा – “कोई खेल नहीं बिगड़ा है भगवन|”

हनुमान जी की बात सुनकर श्रीराम आश्वस्त होकर बोले – “कैसे?”

हनुमान जी बोले – “भगवन! वह ऐसे कि दक्षिण के पर्वत समाप्त हो गए तो क्या हुआ? उत्तर तो अभी पहाड़ों से ढका है| मेरे सैनिक अभी कूच करते हैं और उत्तर दिशा के सभी पहाड़ों-पर्वतों से चट्टानों के ढेर के ढेर लेकर आते हैं|”

यह सुनकर राम की चिंता दूर हुई, पर वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं हुए| उन्हें हनुमान जी की शक्ति पर पूरा विश्वास था| पर वह समझ रहे थे, पता नहीं उत्तराखंड से पत्थर-चट्टानें लाने में कितना समय लग जाए| पुल का निर्माण तो शीघ्र ही होना चाहिए|

हनुमान जी ने पूछा – “क्या सोच रहे हैं प्रभु?”

श्रीराम बोले – “मुझे तुम पर तो भरोसा है, पर ये वानर इस कार्य में कितने सक्षम होंगे, मुझे संदेह है| दूर से चट्टानों का लाना आसान नहीं है| पुल बनने में विलंब को अब रोका नहीं जा सकता|”

हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा – “आप चिंता न करें प्रभु! आपको मुझ पर विश्वास है न?”

श्रीराम बोले – “तुम पर विश्वास नहीं हो तो मुझे अपने पर भी अविश्वास करना पड़ेगा|”

हनुमान जी बोले – “तो करने दीजिए इन वानर-भालुओं को अपना काम| जो कुछ बचता है, मैं उसे पूरा कर दूंगा| मैं हिमालय पर जाकर उसकी एक श्रृंखला को ही उठा लाता हूं|”
हनुमान जी की बात सुनकर राम चिंता मुक्त हो गए| फिर हनुमान जी आकार्श मार्ग से उत्तर की ओर उड़ चले| उन्होंने हिमालय को उखाड़ना चाहा, लेकिन हिमालय भी कम शक्तिशाली नहीं था| बहुत जोर लगाने पर भी पर्वत ने उखड़ा| हनुमान जी व्याकुल होकर सोचने लगे, ‘सेतु निर्माण का काम रुका है| भगवान राम भी क्या कहते होंगे कि मैंने जो कहा, कर नहीं पाया|’

यह सोचकर हनुमान जी ने बल प्रयोग छोड़ा और शिखर से विनती की – “पर्वतराज! मैं तो तुम्हें धन्य-धन्य करने आया था| पुल निर्माण के काम आओगे तो भगवान श्रीराम के चरण कमल तुम पर पड़ेंगे| सचमुच तुम धन्य हो जाओगे|”

पर्वतराज ने कहा – “तो यह पहले बताना था| इतनी देर व्यर्थ ही आजमाइश की| उठाओ मुझे, अब मैं पहाड़ नहीं रहा, फूल बन गया|”

यह सुनकर हनुमान जी ने एक हाथ पर उस पूरे शिखर को उठा लिया और तीव्र गति से समुद्र की ओर चल पड़े| पर देर तो हो ही चुकी थी| हनुमान जी उधर हिमगिरी के शिखर से उलझे थे, इधर वानर-भालुओं ने उत्तर की ओर से लाकर पहाड़ों की चट्टानों का अंबार लगा दिया| पुल बनकर तैयार हो चुका था| अब बचे-खुचे पर्वतों को भी क्यों व्यर्थ में नष्ट करना था| राम की आज्ञा से घोषणा करा दी – “जो जहां पर हो, वहां पर लाए जाने पहाड़ और चट्टान वहीं रख दे|”

सबने ऐसा ही किया| पर हनुमान जी के लिए तो यह वज्रघात के सदृश था| जिस समय उन्होंने यह सुना, वह वज्रमंडल के ऊपर यमुना के आसपास से गुजर रहे थे| उन्होंने हिमालय के उस शिखर को वहीं प्रतिष्ठित करना चाहा तो वह राजी न हुआ|

पर्वत शिखर ने कहा – “आप तो मुझे राम के चरणों का स्पर्श कराने जा रहे थे| इस शर्त पर मैं माना भी था| अब मैं यहां नहीं रहूंगा|”

यह सुनकर हनुमान जी चिंतित हो गए| पर उन्हें अपने महामंत्र पर विश्वास था| उन्होंने मन ही मन श्रीराम का नाम लेकर उनका ध्यान किया| उनके अंदर एक ज्योति पैदा हुई| वह पर्वत से बोले – “आपको भगवान के श्रीचरणों के स्पर्श की आकांक्षा है न? तो वह आपको मिलेगा| यह त्रेता है| द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के रूप में इसी वज्र में अवतरित होंगे| तब एक ही बार नहीं, असंख्य बार वह ग्वालबालों के साथ आपके ऊपर क्रीड़ा करेंगे| आप धन्य हो जाएंगे|”

बात पर्वत शिखर को जंच गई| वह वहीं स्थापित हो गया| वही पर्वत गोवर्धन नाम से विख्यात हुआ| आज भी वह गिरिराज और गोवर्धन के नाम से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर रहा है| भक्तगण इस पर्वत की परिक्रमा कर धन्य-धन्य हो जाते हैं|

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