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हनुमान-मकरध्वज मिलन (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

हनुमान-मकरध्वज मिलन (भगवान हनुमान जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

श्रीराम और रावण युद्ध चरमसीमा पर पहुंच चुका था| एक-एक करके रावण के अनेक सेनापति, पुत्र मेघनाथ, भाई कुंभकर्ण समेत कई राक्षस मारे जा चुके थे| रावण बेचैनी से महल में घूम रहा था| उसे कोई उपाय सुझाई नहीं दे रहा था| एकाएक एक विचार उसके दिमाग में कौंधा – ‘अहिरावण की मदद लेना ज्यादा बेहतर होगा| वह बहुत बड़ा मायावी है| बगैर युद्ध किए ही वह | पूरी वानर सेना का सफाया कर सकता है|’

यह विचार करके उसने तुरंत अपने गुप्तचर बुलाए और उनको आदेश दिया – “तुरंत पाताल लोक में जाकर अहिरावण को मेरा संदेश दो कि लंकाधीश ने तुम्हें तुरंत मिलने का आदेश दिया है|”

रावण का आदेश पाते ही मायावी गुप्तचरों ने तुरंत पाताल की ओर प्रस्थान किया और रावण का संदेश अहिरावण को सुनाया| संदेश सुनकर अहिरावण तुरंत लंका में पहुंचा और बोला – “मेरे लिए क्या आदेश है महाराज?”

रावण बोला – “तुम प्रबल मायावी हो अहिरावण! मैं चाहता हूं कि तुम राम के शिविर में पहुंचकर ऐसी माया फैलाओ, जिससे समूची वानर सेना तुम्हारे मायाजाल में फंसकर रह जाए|”
अहिरावण बोला – “महाराज! माया तो मैं फैला दूंगा, किंतु कितना असर रामादल पर होता है, यह कह नहीं सकता| क्योंकि जिन राम-लक्ष्मण के आगे कुंभकर्ण और मेघनाथ जैसे अजेय योद्धाओं की कुछ न चल सकी| उनके आगे मेरी हस्ती ही क्या है?”

यह सुनकर रावण बोला – “शायद तुम डर गए हो अहिरावण! राम-लक्ष्मण नामक तपस्वियों के डर से तुम्हारा दिल दहला जा रहा है? अगर ऐसा ही है तो तुम रहने दो|”

अहिरावण बोला – “नहीं-नहीं महाराज! घबराने की कोई बात नहीं मेरे लिए| मैं आज रात ही अपनी माया से कुछ चमत्कार दिखाऊंगा|”

यह कहकर अहिरावण रात होते ही राम के शिविर के बाहर पहुंचा और एक जगह छिपकर शिविर का अवलोकन करने लगा, ‘शिविर में प्रविष्ट होना बहुत कठिन है| हनुमान जी ने अपनी पूंछ का घेरा इतना बड़ा और ऊंचा कर रखा है कि चारों ओर एक ऊंची दीवार सी खिंच गई है| अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा| उसने सोचा – ‘क्यों न विभीषण का वेश बनाकर अंदर चला जाऊं| उस पर सब विश्वास भी करते हैं| अगर किसी ने टोका भी तो कोई बहाना बना दूंगा|’

यह सोचकर अहिरावण ने विभीषण का रूप धारण किया और शिविर के द्वार पर हनुमान जी से अपनी पूंछ उठा लेने को कहा – “पवनपुत्र, जरा अपनी पूंछ हटा लो तो मैं शिविर में दाखिल हो जाऊँ|”

हनुमान जी ने आश्चर्य से कहा – “विभीषण जी! इतनी देर तक बाहर क्या करते रह गए थे?”

विभीषण रूपी अहिरावण बोला – “समुद्र तट पर हवन-पूजन करने में कुछ विलंब हो गया था, अभी-अभी निवृत्त हुआ हूं|”

यह सुनकर हनुमान जी ने विभीषण रूपी अहिरावण को अंदर जाने दिया| वह सीधे वहा पहुंचा, जहां राम-लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे| उसने अपनी माया फैलाई, जिससे वहां मौजूद सभी व्यक्ति सो गए| फिर उसने राम-लक्ष्मण को अपने कंधों पर उठाया और मुख्य द्वार से न जाकर भूमि के रास्ते से पाताल की ओर चल पड़ा| पाताल पहुंचकर उसने राम-लक्ष्मण को एक जगह जाकर लिटा दिया और उन पर कड़ा पहरा लगा दिया|

उधर वानर शिविर में सुबह होते ही सब जाग पड़े तो वहां राम-लक्ष्मण को न पाकर वानर में घबराहट फैल गई| काफी देर तक सारे वानर इधर-उधर खोजबीन करने लगे, लेकिन राम-लक्ष्मण का कहीं पता नहीं चला| तब सुग्रीव ने कहा – “हनुमान जी! रात शिविर में कोई अंजान व्यक्ति तो नहीं आया था?”

इनमान जी बोले – “कोई भी तो नहीं आया| लेकिन हां, विभीषण जी कुछ देरी से आए थे| कह रहे थे कि समुद्र किनारे पूजा-अर्चना में कुछ देरी हो गई|

हनुमान जी की बात सुनकर सुग्रीव बोले – “तो फिर विभीषण जी से पता लगाना चाहिए| ये असुर बड़े मायावी होते हैं| क्या पता रावण का कोई दूत माया फैलाकर उन्हें सोते समय उठा ले गया हो?”

तभी विभीषण जी वहां पहुंच गए थे| सुग्रीव ने पूछा – “विभीषण जी, क्या गत रात्रि आप देर से आए थे?”

विभीषण बोले – “नहीं सुग्रीव जी, मैं तो शाम को ही शिविर में आ चुका था| तब से मैं एक क्षण के लिए बाहर नहीं निकला हूं|”

हनुमान जी बोले – “तब फिर प्रभु राम कहां गए? दोनों भाइयों का कोई पता निशान नहीं है|”

विभीषण बोले – “यह जरूर अहिरावण का काम है| वह पाताल लोक का राजा है और वह बहुत मायावी है| देवी का पुजारी है और नाना प्रकार के वेश बदलने में निपुण है| वही ले गया होगा राम-लक्ष्मण को|”

सुग्रीव बोले – “फिर तो निश्चित है कि वही श्रीराम-लक्ष्मण को ले गया है| वही रात में बदले वेश में आया और सोते में ही श्रीराम और लक्ष्मण को माया पाश में फंसाकर ले गया|”

हनुमान जी बोले – “वह कहीं भी क्यों न प्रभु राम – लक्ष्मण को ले गया हो, मैं उसे पाताल से भी खोज निकालूंगा|”

यह कहकर हनुमान जी ने एक लंबी छलांग लगाई और पाताल लोक की ओर उड़ चले| जैसे ही वे पाताल लोक के प्रवेश द्वार पर पहुंचे, उन्हीं जैसे एक ओजस्वी वानर ने उनका रास्ता रोक लिया| वह वानर मकरध्वज था| जो कि हनुमान जी का पुत्र था| लेकिन वह अपने पिता को पहचानता नहीं था| उसने कहा – “ठहरो! कौन हो तुम? जानते नहीं द्वार पर मकरध्वज का पहरा है|”

हनुमान जी बोले – “रास्ता छोड़ो युवक, तुम जानते नहीं कि मैं श्रीराम के कार्य से अंदर जा रहा हूं|”

मकरध्वज बोला – “अंदर पहुंचने से पहले आपको मुझसे युद्ध करना होगा| जानते नहीं मैं हनुमानपुत्र मकरध्वज हूं| महाराज अहिरावण ने विशेष रूप से मुझे द्वार की रक्षा का भार सौंपा है|”

हनुमान जी बोले – “तुम झूठ बोलते हो| मैं ही हनुमान हूं| मेरा कोई पुत्र नहीं है| मैं आजन्म ब्रह्मचारी हूं और जब विवाह ही नहीं किया तो पुत्र कैसा?”

हनुमान जी की बात सुनकर मकरध्वज उनके चरणों में झुक गया और बोला – “मेरा जीवन धन्य हो गया पिताश्री! आज मैंने आपके दर्शन कर लिए|”

हनुमान जी गुस्से से बोले – “छोड़ो मेरे पैर को| तुम अवश्य कोई राक्षस हो, जो बातों में उलझाकर मेरा समय नष्ट करना चाहते हो|”

मकरध्वज बोला – “मैं सच कह रहा हूं पिताश्री! मैं आपका ही पुत्र हूं और स्वयं नारद जी ने मुझे यह बात बताई थी|”

यह सुनकर हनुमान जी सोच में पड़ गए| देवर्षि नारद ने झूठ नहीं कहा होगा| फिर उन्होंने मकरध्वज से पूछा – “देवर्षि नारद ने क्या कहा था?”

मकरध्वज बोला – “देवर्षि नारद ने मुझे अपनी उत्पत्ति की कथा सुनाई थी कि जब आप लंका दहन करके समुद्री मार्ग से ऊपर उड़ रहे थे तो आपके शरीर से पसीना चूकर समुद्र में गिरा| एक मगरी जो ऊपर की ओर मुंह किए थी, उस पसीने को पी गई| बाद में उसी मगरी के पेट से मेरा जन्म हुआ|”

हनुमान जी बोले – “और वह मगरी अब कहां है?”

मकरध्वज बोला – “वह एक बार कुछ मछेरों के जाल में फंस गई थी| मछेरे उसे राजदरबार में लेकर पहुंचे| वहां मगरी का पेट चीरा गया तो मैं शिशु के रूप में जीवित निकला| मगरी मर गई और महाराज अहिरावण की देखरेख में मेरी परवरिश की गई| तब से मैं यहीं हूं, महाराज के द्वार का रक्षक बनकर|”

हनुमान जी बोले – “बड़ी विचित्र बात है, मगरी के पेट से वानर शिशु जन्मे| खैर, में तुम्हारी कहानी को सच मानता हूं कि तुम मेरे पुत्र हो| अब अपने पिता के लिए द्वार खोल दो|”
मकरध्वज बोला – “द्वार तो नहीं खोलूंगा पिताश्री! जिस तरह आप अपने स्वामी के प्रति श्रद्धा रखते हैं, उसी तरह से मैं भी अपने महाराज के प्रति वचनबद्ध हूं|”

हनुमान जी बोले – “तो फिर मैं अंदर कैसे प्रवेश करूंगा?”

मकरध्वज बोला – “आप मुझे परास्त करके बांध दीजिए।| इससे मैं अपने स्वामी के प्रति कृतघ्नता के अपराध से मुक्त हो जाऊंगा और आप भी अपने स्वामी के पास पहुंच जाएंगे|”
हनुमान जी ने पूछा – “मकरध्वज, क्या तुम जानते हो कि आज सुबह या गत रात्रि को अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को यहां लाया है?”

मकरध्वज ने उत्तर दिया – “यह तो मैं नहीं जानता कि वे श्रीराम और लक्ष्मण थे| हां, दो तपस्वियों को वह अपने साथ लाया जरूर है| वे दोनों बेहोश थे| वह उन्हें देवी के मंदिर में ले गया| अहिरावण देवी का पुजारी है| वह उन दोनों की बलि चढ़ाकर देवी को प्रसन्न करेगा और मनचाहा वर प्राप्त कर लेगा|”

यह सुनकर हनुमान जी ने शीघ्रता से मकरध्वज को उसी की पूंछ से बांधकर उसे दरवाजे पर लेटा दिया और शीघ्रता से अंदर प्रवेश कर गए| अंदर का वातावरण बहुत उल्लासपूर्ण था| राक्षस नर-नारियां देवी की पूजा हेतु विविध प्रकार से मिष्ठान और फल वगैरह लेकर देवी के मंदिर में पहुंच रही थीं| हनुमान जी ने छोटा रूप धारण किया और लोगों की नजर बचाकर देवी की प्रतिमा के अंदर जा घुसे|

कुछ ही समय बाद अहिरावण बंदी राम-लक्ष्मण को लेकर देवी मंदिर में पहुंचा और तरह-तरह के मिष्ठान देवी को अर्पण करने के बाद बोला – “देवी माता! आज मैं तेरी वर्षों की कामना पूरी करूंगा| आज इन दो तपस्वियों की बलि चढ़ाकर तुझे प्रसन्न करूंगा|”

देवी की प्रतिमा में बैठे हनुमान जी को गुस्सा आ गया| उन्होंने भेंट में आए पकवानों को खाना आरंभ कर दिया| देखते ही देखते समस्त पकवान खत्म हो गए| अहिरावण सोचने लगा – ‘आज देवी कुछ ज्यादा ही प्रसन्न दिखती हैं| तभी तो सारा प्रसाद खा गई हैं|” यह सोचकर उसने मंत्रियों को आदेश दिया – “और प्रसाद लाओ| आज देवी हमसे बहुत खुश हैं|”

नर-नारी भेंट लाते गए और प्रतिमा में बैठे हनुमान जी उन्हें चट करते गए| यहां तक कि सारे पकवान-मिष्ठान समाप्त हो गए| यह देख अहिरावण बोला – “माता मिष्ठान आदि तो समाप्त हो गए| अब इन दोनों की बलि स्वीकार करो और संतुष्ट हो जाओ|”

यह कहकर अहिरावण ने तलवार निकाल ली और राम-लक्ष्मण का सिर काटना चाहा| तभी हनुमान जी तेजी से प्रतिमा से बाहर निकले और अहिरावण से भिड़ गए| हनुमान जी ने अहिरावण को इतनी कसकर लात जमाई कि वह दूर जा गिरा और तत्काल उसका दम निकल गया| फिर हनुमान जी अन्य राक्षसों पर पिल पड़े और हजारों राक्षसों का वध कर दिया| भगदड़ मच गई और राक्षस नर-नारियां जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए|

फिर हनुमान जी ने श्रीराम और लक्ष्मण के बंधन खोले और उन दोनों को कंधों पर बैठकर द्वार की ओर बढ़ चले| द्वार पर बंधे पड़े मकरध्वज को देखकर श्रीराम ने पूछा – “पवनसुत, यह कौन है? शक्ल-सूरत तो बिल्कुल आपकी प्रतिलिपी है| कहीं ये आपका पुत्र तो नहीं है?”

हनुमान जी ने कहा – “प्रभु! आप ठीक कहते हैं| यह वास्तव में मेरा पुत्र है| मेरे पसीने द्वारा मगरी के गर्भ से इसका जन्म हुआ है| यह बहुत स्वामी भक्त हैं| मुझे अंदर नहीं जाने दे रहा था| विवशता में मुझे इसे बांधकर जाना पड़ा था|”

यह कहकर हनुमान जी ने मकरध्वज के बंधन खोल दिए| श्रीराम ने मकरध्वज से कहा – “वत्स मकरध्वज! पाताल राक्षसों से मुक्त हो चुका है| अहिरावण और उसके साधी मारे जा चुके हैं| आज से तुम्हें पाताल का राजा नियुक्त करते हैं| यहां रहकर तुम पूरी धर्मनिष्ठा से राजकाज करो| मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है|”

उसके पश्चात राम ने मकरध्वज का राज्याभिषेक किया| फिर हनुमान जी दोनों भाइयों को कंधे पर बैठाकर लंका उड़ चले| जैसे ही हनुमान जी राम-लक्ष्मण को लेकर शिविर में दाखिल हुए, वानरों के मुरझाए चेहरों पर फिर से रौनक लौट आई और सारी वानर सेना खुशी से झूम उठी|

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